गाय का महत्त्व (भाग -1)

गोवंश रक्षण, पालन तथा संवर्ध्न
      हिन्दु गाय को परम्परा से माता मानते आए हैं, परन्तु गौ केवल हिन्दुओं की माता ही नहीं है अपितु ‘गावो विश्वस्य मातर:- गौवें समस्त विश्व की माता हैं। गाय समान रूप से विश्व के मानव मात्रा का पालन करने वाली मां है। गो के शरीर में तैंतीस करोड़ देवता निवास करते हैं। एक गाय की पूजा करने से स्वयंमेव करोड़ों देवतओं की पूजा हो जाती है। माता: सर्वभूतानाम गाव: सर्वसुखप्रदा:- गाय सब प्राणियों की माता है और प्राणियों को सब प्रकार के सुख प्रदान करती है।
गाय का धर्मिक, सांस्कृतिक महत्त्व
      Íगवेद में गाय को ‘अघन्या’ कहा है। यजुर्वेद कहता है, ‘गो:मात्राा न विद्यते’ अर्थात् ‘गो अनुपमेय है।’ अथर्ववेद में गाय को ‘ध्ेनु: सदनम् रयीणम्’ अर्थात् ‘गाय संपत्तियों का घर है।’ अमृतपान से ब्रह्मा जी के मुख से पफेन निकला, उससे गोएं उत्पत्रा हुर्इ। ब्रह्माण्ड पुराण में भगवान व्यासदेव ने गो-सावित्राीस्तोत्रा में कहा, ‘समस्त गौएं साक्षात् विष्णुरूप् हैं, उनके सम्पूर्ण अंगों में भगवान केशव विराजमान रहते हैं। पद्यपुराण का कथन है, गौ के मुख में “ाडड्ग और पदक्रम सहित चारों वेद रहते है। स्कन्द पुराण के अनुसार गौ सर्वदेवमयी और वेद सर्वगोमय हैं। महाभारत में कहा है, ‘अंगों और मंत्राों सहित समस्त वेद हर्षित होकर नाना प्रकार के मंत्राों से गौ की स्तुति करते हैं। ब्रह्मा-विष्णु-महेश कामध्ेनु की स्तुति निम्न प्रकार करते हैं: त्वं माता सर्वेदेवाना त्वं च मत्तस्य कारणम्। त्वं तीर्थ तीर्थानां नमस्ते¿सतु सदानघे। भगवान कृष्ण को सारा ज्ञानकोष गोचरण से ही प्राप्त हुआ। जिससे आगे चलकर संसार उ(ार करने वाली गीता का ज्ञान निकला। श्रीकृष्ण गो सेवा से जितने शीघ्र प्रसन्न होते हैं, उतने अन्य किसी सेवा से नहीं। गणेश भगवान का सिर कटने पर महादेव का दाम एक गाय रखा गया और वही पार्वती को देनी पड़ी।
      हम जानते हैं कि भगवान राम के पूर्वज महाराज दिलीप नन्दिनी गाय की पूजा करते थे और उसके पीछे-पीछे घूमते थे। एक बार सिंह ने उनकी गाय पर आक्रमण कर दिया। महाराज दिलीप ने गाय को छोड़ने के बदले सिंह को अपना शरीर अर्पण कर दिया। भगवान परीक्षा ले रहे थे जिसमें महाराजा दिलीप उत्तीर्ण हुए और उनको संतान की प्राप्ति हुर्इ। इसी से उनका वंश चला और हमको भगवान राम जैसे महापुरुष की प्राप्ति हुर्इ।
      भगवान कृष्ण का एक सर्वप्रिय नाम गोपाल है। वे नंगे पांव गायों को चराते थे। इन्द्र के प्रकोप को टालने के लिए उन्होंने ग्वालों को साथ लेकर गोवर्ध्न पर्वत को उठाकर गोवंश ओर समाज की रक्षा की। भगवान माखन चोर कहलाते हैं। वे न केवल स्वयं मक्खन खाते थे अपने ग्वालबालों को भी खिलाते थे। भगवान भोलेनाथ शिव का वाहन, नन्दी कहते हैं भारत के
दक्षिण की ओंगोल नस्ल का सांड था। जैन आदि तीर्थकर भगवान )षभदेव का चिन्ह बैल था।
      सब ओर शिव मंदिरों में नन्दी की मूर्ति रहती है जो भगवान शिव के मंदिर के सामने उनकी ओर मुंह किए रहती है। भगवान कृष्ण अपनी बांसुरी से न केवलर गौओं को रिझाते थे, परंतु दूध् निकालने के समय भी उनको बांसुरी की ध्ुने सुनाते थे। आजकल गोदुग्ध् लेते समय संगीतवादन उसी परम्परा का एक भाग है।
      प्राच्य जगत में हिन्दुओं की गो पूजा के समान ही पारसी लोग सांड की पूजा करते थे। वहां के प्राचीन सिक्कों पर तथा पिरामिड में बैलों की मूत्तियां अंकित है। इजिप्शियन चित्रा लेखों में 1995 में पूर्ण गोपुराण का अनुवाद हुआ। र्इस्वी पूर्व छठी शताब्दी से भारत के स्वतंत्रा होने तक गौ और वृषभ प्राय: अ​िध्कांश शासकों के सिक्कों पर अंकित रहते थे।
      गोस्वामी तुलसीदास के अनुसार ध्र्म, अर्थ, काम मोक्ष में चारों पफल गाय के चार थन हैं। संत एकनाथ भागवत ध्र्म में गोसेवा का विशेष स्थान बताते हैं। महात्मा नामदेव ने दिल्ली के बादशाह के आह्वान पर मृत गाय को जीवन दिया। शिवाजी महाराज को समर्थ रामदास की कृपा से ‘गो ब्राह्मण प्रतिपालक’ उपाध् िप्राप्त हुर्इ। दशम गुरु गोविन्दसिंह ने ‘चण्डी दी वार’ में दुर्गा भवानी से गो-रक्षा की मांग की है: ‘यही देहु आज्ञा तुर्क गाहै खपाऊं। गऊघात का दोष जग सिउ मिटाऊं। उन्होंने यह भी कहा: ‘यही आस पूरन करो तू हमारी, मिटे कष्ट गौअन, छटै खेद भारी।।’
      भगवान बु( को गया के पास उस क्षेत्रा के सरदार की बेटी सुजाता द्वारा गायों की दूध् की खीर खाने पर तुरंत ज्ञान और मुक्ति का मार्ग मिला। गाय को वे मनुष्य की परममित्रा ‘गावो नो परमा मित्ता’ कहते हैं। जैन आगमों में कामध्ेनु को स्वर्ग की गाय कहा है और प्राणिमात्रा को अवèया माना है। भगवान महावीर स्वामी के अनुसार ‘गो रक्षा बिना मानव रक्षा संभव नहीं। पैगम्बर हजरत मुहम्मद ने कहा है, ‘गाय का दूध् रसायन, गाय का घी, अमृत तथा मांस बीमारी हैं।’ साथ ही ‘गाय दौलत की रानी है।’ र्इसा मसीह ने कहा है, ‘एक बैल को मारना, एक मनुष्य को मारने के समान है।’
      आध्ुनिक महापुरुषों ने भी गौ के सम्बन्ध् में अपने विचार व्यक्त किए हैं। स्वामी दयानन्द सरस्वती ‘गो करुणा निध्’ि में कहते हैं, ‘एक गाय अपने जीवनकाल में 8, 10, 660 मनुष्यों हेतु एक समय का भोजन जुटाती है, जबकि उसके मांस से 50 मांसाहारी केवल एक समय अपना पेट भर सकते हैं।’ पूज्य गांध्ी जी ने कहा है, ‘गोरक्षा का प्रश्न स्वराज्य के प्रश्न से भी अध्कि महत्त्वपूर्ण है।’ उनका कहना है, गोवंश की रक्षा र्इश्वर की सारी मूक सृष्टि की रक्षा करना है। भारत की सुख-समृ(ि गौ के साथ जुड़ी हुर्इ है।’ गाय उन्नति और प्रसन्नता की जननी है। गाय कर्इ प्रकार से अपनी जननी से
भी श्रेष्ठ है।’
      लोकमान्य बालगंगाध्र तिलक ने कहा था कि ‘स्वतंत्राता प्राप्ति के बाद कलम की एक नोक से पूर्ण गोहत्या बंद कर दी जाएगी।’ चाहे तुम मुझे मार डालो, पर गाय पर हाथ न उठाओं।  प्रथम राष्ट्रपति डाñ राजेन्द्रप्रसाद ने कहा था, ‘‘भारत में गोपालन सनातन ध्र्म है।’ पूज्य देवराहा बाबा कहते थे, ‘जब तक गोमाता का रुध्रि भूमि पर गिरता रहेगा, कोर्इ भी धर्मिक तथा सामाजिक अनुष्ठान सपफल नहीं होगा।’ भार्इ हनुमान प्रसाद पौ(ार कहते हैं, जब तक भारत की भूमि पर गोरक्त गिरेगा, तब तक देश सुख-शांति और ध्न-धन्य से वंचित रहेगा।’ स्व जयप्रकाश नारायण जी कहते थे, ‘हमारे लिए गोहत्या बन्दी अनिवार्य है।’
गाय का वैज्ञानिक महत्त्व:
1.    गाय के दूध में रेडियो विकिरण (एटामिक रेडिएशन) से रक्षा करने की सर्वाधिक शक्ति होती है ऐसा रूसी वैज्ञानिक शिरोविच कहते है।
2.    गाय कैसा भी तृण पदार्थ यहां तक की विषैला भी खाए, उसका दूध तब भी निरापद एवं शुद्ध होता है।
3.    जिन घरों में गाय के गोबर से लिपार्इ-पुतार्इ होती है, वे घर रेडियो विकिरणों से सुरक्षित होता है।
4.    गाय का दूध हृदय रोग से बचाता है।
5.    गाय का दूध शरीर में स्फूर्ति, आलस्यहीनता तथा चुस्ती लाता है।
6.    गाय का दूध स्मरणशक्ति को बढ़ाता है।
7.    गाय के घी के अग्नि पर डालकर घुआं करने अथवा इससे हवन यज्ञ करने से वातावरण एठामिक रेडिएशन से बचाता है।
8.    गाय एवं उसकी संतान के रंभाने की आवाज से मनुष्य की अनेक मानसिक विकृतियाँ एवं रोग स्वयमेव दूर हो जाते हैं।
9.    मद्रास के डा किंग के अनुसंधन के अनुसार गाय के गोबर में हैजे के कीटाणुओं को नष्ट करने की शक्ति है।
10.   क्षय रोगियों को गाय के बाड़े या गोशाला में रखने से गोबर और गोमूत्र की गंध से क्षय रोग की कीटाणु मर जाते हैं।
11.   एक तोला घी से यज्ञ करने पर एक टन आक्सीजन बनता है।
12.   रूस में प्रकाशित शोध जानकारी के अनुसार कत्लखानों से भूकम्प की संभावनाएं बढ़ती हैं।
13.   गाय की रीढ़ में सूर्यकेतु नाड़ी होती है जो सूर्य के प्रकाश में जागृत होती है। नाड़ी के जागृत होने पर वह पीले रंग का पदार्थ छोड़ती है। अत: गाय का दूध पीले रंग का होता है। यह केरोटिन तत्व सर्वरोग नाशक, सर्वविष विनाशक होता है।
14.   गाय के घी को चावल के साथ मिलाकर जलाने से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण गैसें, जैसे इथीलीन आक्साइड, प्रोपलीन आक्साइड आदि बनती है। इथीलीन आक्साइड गैस जीवाणु रोधक होने के कारण ऑप्रेशन थियेटर से लेकर जीवन रक्षक औषधि बनाने के काम आती है। वैज्ञानिक प्रोपलीन आक्साइड गैस को कृत्रिम वर्षा का आधार मानते हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *