श्री कृष्ण लीला के उपकरणों में गाय [1]

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श्री कृष्ण लीला के उपकरणों में गाय [1]
ब्रजराज गोशाला में बछड़ों की देखभाल करने गए हैं और ब्रजरानी अपने प्राणधन ललन के लिए भोजन बनाने में मग्न हैं
राम-श्याम दोनों भाई आँगन में खेल रहे हैं
अबतक दोनों भाई मइया एवं बाबा की गोद में चढ़कर ही द्वारदेश एवं गोशाला आदि में जाते थे, आज स्वतंत्र रूप से दोनों भाई तोरण द्वार की ओर चल पड़े 
कभी खड़े होकर कुछ डग चलते, कभी घुटने के बल, इस तरह बाहर चले आये, आम्र की शीतल छाया में कुछ गोवत्स विश्राम कर रहे थे, धीरे-धीरे उनके पास जा पहुंचे, बछड़े की सुकोमल पूंछ को देखकर आश्चर्यचकित होकर विचारने लगे, यह क्या है 
फिर दोनों भाईयों ने अपने नेत्र कमलों को नचाकर मानो कुछ परामर्श-सा किया और धीरे से एक ही साथ पूंछ को दोनों हाथों से मुठ्ठी बांधकर पकड़ लिया 
अचानक पूंछ खिच जाने से उठ खड़ा हुआ तथा भागने लगा
अचिन्त्यलीलामहाशक्ति ने इसी क्षण श्यामसुन्दर की स्वभाविक अनंत असीम सर्वज्ञता पर बाललीलोचित मुग्धता की यवनिका गिरा दी, दोनों भाई बछड़े से खिंच जाते हुए भयभीत हो उठे
वे भगवान श्री कृष्ण यह ज्ञान भूल गए कि पूंछ छोड़ देने से ही बछड़े का सम्बन्ध छूट जायेगा, बल्कि उन्होंने तो अपनी रक्षा के लिए और भी अधिक शक्ति लगाकर पूंछ को जकड़ लिया तथा माँ-माँ, बाबा-बाबा पुकारने लगे और रोने लगे
उसी क्षण समस्त ब्रजवनीताओं की हृदय-बोल पर माँ-माँ बाबा-बाबा की करुणामिश्रित स्वरलहरी झंकृत हो उठी, क्योंकि उनके हरनतन्तु सर्वथा श्याममय होकर निरंतर श्याम सुन्दर से ही जुड़े रहते थे
अतः जो जहाँ जिस अवस्था में थीं, चल पड़ीं, इतनी शीघ्र कैसे आ पहुंची यह किसी ने नहीं जाना पर सभी आ पहुंचीं
सबने देखा, भयभीत गोवत्स धीरे-धीरे भाग रहा है तथा उसकी पूंछ पकड़े नीलमणि एवं दाऊ माँ-माँ, बाबा-बाबा की पुकार करते हुए खिंचे चले जा रहे हैं 
अचिन्त्यलीला-शक्ति के महान प्रभाव से कुछ क्षण सभी किंकतर्व्यविमूढ़- सी हो गयीं, इसी समय उपनन्द-पत्नी ने शीघ्रता से बछड़े के आगे जाकर उसे थाम लिया इतने में नंदरानी एवं नंदराय भी आ पहुंचे, बेटा नीलमणि दाऊ पूंछ छोड़ दे 
कहते हुए दोनों ने हाथ से पकड़कर पूंछ छुड़ा दी, नंदरानी ने नीलमणि एवं दाऊ को अपनी गोद में ले लिया, दोनों का मुख चूमने लगीं
इधर व्रजसुंदरियों में हंसी का स्त्रोत उमड़ पड़ा, बाललीलाबिहारी इस अद्धुत अभूतपूर्व ललित लीला को देखकर सभी हँसते-हँसते लोट-पोट हो गईं 
एक ग्वालिन बोली कि नीलमणि, अरे दाऊ, तुम दोनों भला इस बछड़े से भी दुर्बल हो, अरे पूंछ पकड़कर बछड़े को रोक लेते या पूंछ पकड़े-पकड़े सारे व्रज में घूम आते, यह बछड़ा तुम्हें व्रज में घुमा लाता, हम लोग अपने-अपने घर ही पर तुम्हें देखकर निहाल होतीं,बछड़े भी निहाल होते
यों कहते-कहते ग्वालिन की आँखों में प्रेम के आंसू छल-छल करने लगे, श्यामसुन्दर हंसने लगे मानों संकेत से कह रहे हों-एवमस्तु
इसके पश्चात् व्रजराजनन्द ने बछड़ों को अपने करस्पर्श का योगीन्द्र-मुनीन्द्र-दुर्लभ आनन्द देते हुए इस परम सुन्दर लीला का अनेकों बार प्रकाश किया

कुछ ऐसी ही लीलाएं भगवान श्री कृष्ण ने गायों पर दिखाई हैं जो आज भी इतिहास के पन्नों में सुनहरे अक्षरों में लिखी हुई हैं

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