यह केवल एक लेख नही यह 100% सत्य है।

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यह केवल एक लेख नही यह 100% सत्य है।
भारतीय गाय की तस्करी की रक्तरंजित दास्तान………
वर्ष के कुछ दिनों में जैसे महावीर जयंती, गांधी जयंती और रामनवमी आदि जैसे दिवस पर बूचड़खाने बंद रखे जाने के सरकारी आदेश हैं।
विश्व में भारत मांस पूर्ति की सब से बड़ी मंडी है।
नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बन जाने के पश्चात् अमेरिका, सऊदी अरब, जापान, कोरिया और ताईवान में मांस आयात करने वालों को इस बात का भय पैदा हो गया है कि भारत से अब मांस की पूर्ति होने में कठिनाई पैदा हो सकती है।
भारत गाय और भैंस की बड़ी मंडी है इसलिये वहां से यदि मांस की पूर्ति नहीं होगी तो मांसाहारियों के लिये और पशु पर आधारित तैयार होने वाली वस्तुओं के उत्पादन करने में भी भारी कठिनाइयां पड़ सकती है।
विदेशियों की दृष्टि में पशु धन कच्चा माल है लेकिन भारत में करोड़ों व्यक्तियों के लिये यह आस्था का सवाल है।
इसके बावजूद प्रतिदिन मांसाहार के लिये सैकड़ों पशुओं की हत्या होती रहती है।
मांसाहार के नाम पर भारत का पशुधन बड़ी बेदर्दी के साथ लोगों के पेट में चला जाता है अथवा डालर, दीनार और किसी न किसी मूल्यवान मुद्रा के लिये अंतरराष्ट्रीय बाजार में व्यापार के लिये कच्चामाल हो जाता है।
यदि आप के सम्मुख एक ऐसी गाय का चित्र प्रस्तुत किया जाए जिसके मुंह को सुई धागे से किसी कपड़े की तरह सी दिया गया है जैसे कोई टेलर कपड़े को सीलता है।
उसकी आंखों में लाल मिर्ची को पीस कर उसका पाउडर डाल दिया गया है।
जब मुंह बंद होगा तो गाय, बैल और बछड़ा चीख नहीं सकता, बोल नहीं सकते और सभ्य भाषा में लिखूं तो वह रंभा नहीं सकते।
केवल उसकी आंखों में आंसू जारी रहते हैं।
आंखें इसलिये बंद है कि उसके छलकते आंसू कोई देख न सके।
भारत की सीमाएं अपने पड़ोस के सात देशों से मिलती हैं।
इसमें कुछ देश तो भगवान बुध्द के अनुयाई हैं और बांग्लादेश तथा पाकिस्तान इस्लामी देश हैं, वे मांस भक्षी हैं।
इसलिये भारतीय गौ वंश की तस्करी इन देशों में बड़े प्रमाण में होती हैं।
यह सिलसिला साल भर चलता है क्योंकि इन पशुओं का मांस जहां उदरपूर्ति के लिये उपयोग किया जाता है वही पशु के अन्य अव्यय किसी न किसी काम उपयोग किये जाते हैं।
यही कारण है कि उनकी मांग विदेशी बाजार में बनी रहती है।
ईद के समय इसकी संख्या दुगुनी हो जाती है।
कहने को तो सरकारी तौर पर प्रतिबंध है लेकिन पशुओं का स्मगल होना एक खुला रहस्य है।
भारत की वे नदियां जो बांग्लादेश और पाकिस्तान में जा कर अन्य नदियों में मिल जाती है।
अथवा पाक और बांग्लादेश अधिकृत सीमाएं पार कर समुद्र में विलीन हो जाती है।
इन नदियो के माध्यम से गायों की बड़ी तस्करी होती है।
चूंकि तस्करी का मामला जोखिम भरा होता है इसलिये वहां इसके दाम भी ऊंचे आते है।
तस्करी का रहस्य खुल न जाए इसलिए गाय, बैल और बछड़े के मुंह को सी दिया जाता है ताकि घबराहट में चीखने पर किसी को पता नही चले।
गाय-बैलों के सिले हुए मुंह और बंद आंखों से टपकते आंसू देख कर लोगों का दिल व्यथित हो जाता है।
लेकिन जो निष्ठुर हो कर इस खून के व्यवसाय में लिप्त हैं उन्हें तनिक भी अफसोस नहीं होता है।
पशु की जान लेना तो अधर्म है ही लेकिन इस प्रकार उसे तड़पा तड़पा कर मारना कहां का न्याय है?
क्या दुनिया में मानवता की दुहाई देने वाले और गौशाला के नाम पर लाखो रूपये हजम करने वाले लोग तथा उनके संगठन इस दिशा में कुछ काम करेंगे?
आज तो पैसों की झंकार और दौलत की चमचमाहट में उन्हें कुछ भी नहीं दिखलाई पड़ता है।
भारतीय सीमाओं पर तैनात हमारे सुरक्षा दल के कुछ सैनिकों ने जान की बाजी लगा कर इन पर निशाचों के विरुध्द कार्यवाही की जिसमें दो घुसपैठिये मारे गए।
इस कार्यवाही के बदले में हमारी सरकार ने चारों सैनिकों को निष्कासित कर दिया।
उन तस्करों के परिवारजन को एशियन ह्यूमन कमीशन द्वारा भारतीय सैनिकों के विरुध्द शिकायत के बहाने पांच-पांच लाख रुपये की सहायता प्रदान की।
सैनिकों को दंड और तस्करों और पुरस्कार यह है हमारी भारत सरकार का न्याय?
इस घटना से पाठकों की यह जानकारी मिल जाएगी कि अपनी जान की बाजी लगाने वालों के साथ सरकार का व्यवहार क्या होता है और तस्करों को किस प्रकार सम्मानित कर उन्हें अपनी अवैध गतिविधियों के लिये पुरस्कृत किया जाता है?
बोर्डर सिक्युरिटी फोर्स के कमांडर उत्तम
कुमार बंसल ने अपनी सेवानिवृत्ति के समय 2012 में सरकार से यह गुहार लगाई थी यदि सब कुछ ऐसा ही करना है तो तस्करी पर रोक लगाने के स्थान पर उन्हें वैधानिक रूप से यह अधिकार दे दिया जाए कि वे यह सब बंद कर के भारतीय गौवंश का निर्यात कर सकते हैं। इससे गौ माता का तो छुटकारा नहीं होगा लेकिन वे गौभक्त तो इन सरकारी अधिकारियों और तस्करों के अत्याचारों से छूट जाएंगे।
आज तो गौ की भी हत्या होती है और उनके भक्त जो उनको बचाना चाहते हैं उन्हें भी अपनी जान से हाथ धोना पड़ता है।
उक्त प्रस्ताव का बांग्लादेश के वाणिज्य मंत्री ने बड़ी बेशर्मी के साथ स्वागत किया।
क्या इस प्रकार की कार्यवाही गौभक्तों के जले पर नमक छिड़कने समान नहीं है।
भारत सरकार की इस निष्क्रियता के कारण बकरी ईद के अवसर पर भारत का 40 लाख पशु धन जिसमें गाय, भैंस और बकरे बकरियां तथा भेेंडे थी वे बांग्लादेशियों की जीभ के हवाले कर दी गई।
बांग्लादेश के बड़े समाचार पन्नों ने अपने 13 अक्तूबर 2013 के अंक में यह सारी जानकारी प्रकाशित की है।
एक अत्यंत विश्वसनीय गैर सरकारी संस्था से मिली जानकारी के अनुसार प्रतिदिन 81 हजार डालर के मूल्य का भारतीय पशुधन भारत से बांग्लादेश की सीमाओं में घुसा दिया जाता है।
यह प्रवेश खुले रहस्य जैसा है।
भारत सरकार को सब कुछ पता है लेकिन डालर की मार ने उनके प्रभावशाली लोगों को गूंगा, बहरा और अंधा बना दिया है।
बांग्लादेश में कटने वाली हर दूसरी अथवा तीसरी गाय भारतीय होती है।
इस पशुधन से उन्हें केवल चटखारे मार कर खाने वाला मांस ही नहीं मिलता।
पशु का हर अव्यय अब रुपये की टक्साल
है।
बाल, चमड़ा, हड्डी, सींग, खुर और आंत नोट छापने की मशीन है।
जब इतनी सरलता से लक्ष्मी मिल जाती है और वे धन्ना सेठ बन जाते हैं तो फिर उन्हें दूसरा व्यापार करने की आवश्यकता ही क्या है?
एक वैज्ञानिक के कथनानुसार इन वस्तुओं
से साढ़े चार हजार प्रोडक्टस तैयार होते हैं।
गाय और भैंस की आंत बड़ी लम्बी होती है उसके पाउडर से जंगल में लगी आग बुझाई जाती है।
ब्राजील के जंगलों में आग लग जाना एक सामान्य बात है।
इसलिये भारत और अन्य देश इसका पाउडर तैयार कर ऊंचे दामों पर बेचते हैं।
बांग्लादेशी खुले आम कहते हैं कि भारत का हर पशु हमारे यहां नोट छापने की मशीन है।
आपको घर बैठे टक्साल चाहिये तो बस भारतीय पशु को विदेश में स्मगल कर के रातों रात करोड़ पति बन जाइये।

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