10 पञ्चगव्य चिकित्सा

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पञ्चगव्य चिकित्सा 
१ – आक की छाल तथा आक की कोंपले या छोटी-छोटी कोमल पत्तियाँ ५०-५०ग्राम इन दोनों को २००ग्राम आक के दूध में पीसकर गोला बनाकर मिट्टी के पात्र में मुँह बंद करके गाय के गोबर से बने कण्डो की आँच मे फूँक कर भस्म बना ले । ठंडा होने पर भस्म को निकालकर मटर जैसी छोटी-छोटी गोलियाँ बनाकर एक दो गोली पानी के साथ लेने से भगन्दर व नासूर दूर होते है । 


२ – छुवारों के अन्दर की गुठली निकालकर उसमें आक का दूध भर दें ,फिर इनके उपर आटा लपेटकर पकावें ,उपर का आटा जब जल जाये तब उसमें से छुवारे निकाल कर उन्हें पीसकर मटर जैसी गोलियाँ बनाकर रात्रि मे१-२ गोली खाकर तथा गाय का दूध पीने से स्तम्भन होता है ( वीर्य देर से झड़ता है ) । 


३ – आक का दूध व असली मधु और गाय का घी ,सम्भाग चार पाँच घण्टे खरल कर शीशी में भरकर रख ले ,इन्द्री सीवन और सुपारी को बचाकर इसकी धीरे- धीरे मालिश करें और ऊपर से खाने का पान और एरण्ड का पत्ता बाँध दें ,इस प्रकार सात दिन मालिश करें ।फिर १५ दिन छोड़कर पुनः मालिश करने से शिश्न के समस्त रोगों में लाभ होता है । 


४ – आक की जड़ छाया में सुखाकर चूर्ण बना ले ,२० ग्राम चूर्ण आधा किलो दूध में उबालकर इसकी दही जमा दें, और घी तैयार कर लें , इसके सेवन से नामर्दी दूर होती है । 


५ – बाँझपन:- सफ़ेद आक की छाया में सूखी जड़ को महीन पीसकर १-२ ग्राम की मात्रा में २५० ग्राम गाय के दूध के साथ सेवन करावें ।शीतल पदार्थों का पथ्य देवें ।इससे बन्द ट्युब व नाड़ियाँ खुलती है व मासिक धर्म व गर्भाशय की गाँठों में भी लाभ होता है । 


६ – आक के २-४ पत्तों को कूटकर पोटली बना, घी लगाकर तवें पर गर्म कर सेंक करें ।सेंकने के पश्चात् आक के पत्तों पर घी चुपड़कर गरम कर बांध दें । 


७ – आक के दूध में सम्भाग शहद मिलाकर लगाने से दाद शीघ्र ही नष्ट हो जाता है । 


८ – आक की जड़ २ ग्राम चूर्ण को २ चम्मच दही में पीसकर लगाते रहने से भी दाद में लाभ होता है । 


९ – आक के ताज़े पत्तों का रस १ कि० ग्राम गाय का दूध २ कि० ग्राम सफ़ेद चन्दन, लाल चन्दन ,हल्दी ,सोंठ और सफ़ेद ज़ीरा ६-६ ग्राम इनका कल्क कर १ कि० ग्राम घी में पकावें ,घी मात्र शेष रहने पर छानकर रख लें ।मालिश करने से खुजली – खाज आदि में लाभ होता है । 


१० – आक का दूध ताज़ा ,व सुखाया हुआ १ भाग १०० बार जल से धोया हुआ गाय का मक्खन ख़ूब खरल करके मालिश करें व २ घंटे तक शीत जल व शीत वायु से रोगी को बचाये रखें । 

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