14.पञ्चगव्य- चिकित्सा

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…………. पञ्चगव्य- चिकित्सा………….. 


१ – बलवर्धन- ११.५ ग्राम ताज़ी अमरबेल को कुचलकर स्वच्छ महीन कपड़े में पोटली बाँधकर १/२ किलोग्राम गाय के दूध में डालकर या लटकाकर धीमी आँच में पकाये । जब एक चौथाई दूध जल जाय ,तब ठंडा कर मिश्री मिलाकर सेवन करने से निर्बलता दूर होती है ।विशेष ब्रह्मचर्य में रहना आवश्यक है । 


२ – स्तन्यजनन – स्तन में दूध की वृद्धि गेहूँ की सूजी १ ग्राम ,अखरोट के पत्ते १० ग्राम पीसकर दोनों को मिलाकर , गाय के घी में पूरी बनाकर सात दिन तक खाने से स्तन्य ( स्त्री दूग्ध ) की वृद्धि होती है । 


३ – अखरोट का १० से ४० ग्राम तैल ,२५० ग्राम गोमूत्र में मिलाकर पीने से सर्वंागशोथ में लाभ होता है । 


४ – वात प्रधान फोड़े में अगर जलन और वेदना हो तो तिल और अलसी को भूनकर गाय के दूध में उबालकर ,ठंडा होने पर उसी दूध में उन्हें पीसकर फोड़े पर लेप करने से लाभ होता है । 


५ – अमलतास के ८-१० पत्रों को पीसकर ,गाय के घी में मिलाकर लेप करने से विसर्प में लाभ होता है । 


६ – किक्कसरोग,सद्योव्रण में अमलतास के पत्तों को स्त्री के दूध में या गाय के दूध मे पीसकर लगाना चाहिए । 


७ – अमलतास की १०-१५ ग्राम मूल या मूल त्वक को गाय के दूध में उबालकर पीस लें ,दाह व दाद के स्थान पर लगाने से लाभ होता है । 


८ – शिशु की फुन्सी – अमलतास के पत्तों को गौदूग्ध में पीसकर लेप करने से नवजात शिशु के शरीर पर होने वाली फुंसी या छालें दूर हो जाते है । 


९ – व्रण – अमलतास ,चमेली करंज इनके पत्तों को गोमूत्र के साथ पीसकर लेप करें ,इससे व्रण ( घाव ) दूषित अर्श और नाड़ी व्रण नष्ट होता है । 


१० – अमलतास की जड़ को गोमूत्र में पीसकर लेप लगाने से कुष्ठ रोग से उत्पन्न हुई विकृत त्वचा को हटाकर व्रण स्थान को समतल कर देता है । 

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