26. गौ – चिकित्सा.(योनिभ्रंश)

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( 26 ) – गौ – चिकित्सा.योनिभ्रंश । 


………गौ – चिकित्सा-योनिभ्रशं रोग.- बच्चेदानी का बाहर निकल आना ………
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१ – योनिभ्रशं रोग ( गाय के बैठने के बाद योनि से शरीर बाहर आना ) – यह बिमारी गाय- भैंसों में होती है ।बच्चेदानी का बाहर निकल आना , मुख्यत: यह रोग दो कारणों से ज़्यादा होता है ।
१- पशु के शरीर में कैल्शियम की कमी के कारण ज़्यादा होता है ।
२- गाय- भैंस गाभिन अवस्था में जिस स्थान पर बाँधी जाती है उस स्थान के फ़र्श में ढाल होने के कारण । क्योंकि गाय के शरीर में पीछे ही बच्चे का ज़ोर रहता है और पिछले पैरों मे ढाल हाे तो यह बिमारी अवश्य होती है ।।
३- यह रोग कमज़ोर व वृद्ध मादा पशुओं को अधिक होता है ,जिन मादा पशुओं को शीत, गर्मी की शिकायत होती है उन्हें भी यह रोग होता है ।
४ – लक्ष्ण- प्रसवअवस्था से पहले या बाद में रोगी पशु बच्चे काे या जेर को बाहर निकालने के लिए ज़ोर लगाता है ,तब बच्चेदानी अक्सर बाहर आ जाती है ।पशु की बच्चेदानी बाहर उलटकर निकल जाती है । पशु अत्यन्त बेचैन रहता है ।उसे ज्वर आ जाता है ।उसके होंठ सुख जाते है । वह कराहता है ।कभी-कभी कापँता है ।वह ऐंठता रहता है ।

२ – औषधि – कलमीशोरा २५० ग्राम , सत्यनाशी बीज २५० ग्राम , खाण्ड २५० ग्राम , सत्यनाशी बीजों को कूटकर लड्डू बना लें और खाण्ड में कलमीशोरा मिलाकर आधा लीटर पानी में घोलकर २-३ नाल बनाकर पशु को एकसाथ पिलाऐ , एकबार दवा देने से ही बिमारी ठीक हो जाती है ।
यदि किसी गाय-भैंस के बारे मे शसयं हो कि इसे योनिभ्रशं हो सकता है तो उसे बिमारी होने से पहले भी दवा दें सकते है ।

३ – औषधि – कलमीशोरा ५०० ग्राम , इश्बगोल ५०० ग्राम , माजूफल ४०० ग्राम , बच १०० ,तज १०० ग्राम , कुटकर चार खुराक बनालें । यह औषधि किसी भी विधि से पशु के पेट में जानी चाहिए , पशु अवश्य ठीक होगा ।

४ – औषधि- सत्यनाशी बीज २५० ग्राम , माई १५० ग्राम , सुपारी १५० ग्राम ,इश्बगोल भूसी ५० ग्राम ,इश्बगोल बीज २५० ग्राम , इश्बगोल को छोड़कर बाक़ी सभी दवाइयों को कूटकर इश्बगोल को मिलाकर ५०-५० ग्राम की खुराक बना लें ।एक खुराक को ५०० ग्राम पानी में डालकर रात्रि में रख दें प्रात: हाथ से मथकर पिला दें । १७ दिन तक देने से लाभ होगा ।

५ -औषधि – महाबला चूर्ण १०० ग्राम , सुपारी ५० ग्राम , चने का बेसन २५० ग्राम ,महाबला ( खरैटी ) के पत्तों का चूर्ण बनाकर पाँच खुराक बना लें और पानी मिलाकर नाल से ५ दिन तक देवें ।

६ -औषधि – तिलपत्री के पौधों को लेकर ताज़ा कुट्टी काटकर भी दें सकते है नहीं तो चूर्ण बनाकर घोलकर नाल से दे सकते है । या ताज़ा पौधों का रस निकालकर एक – एक नाल पाँच दिन तक देने से रोग ठीक होता है ।

७ – आलोक -:- ऐसे रोगी पशु को प्रसव के समय ,एक पाॅव शराब को आधा लीटर पानी में डालकर पिलाऐ ।इससे प्रसव आसान होगा, पशु को दर्द कम होगा ।
रोगी पशु के अगले दोनों पैर घुटने के बीच एक रस्सी द्वारा बाँधकर ज़मीन पर उसका अगला गोडा टीका देंना चाहिऐ । रोगी के पिछले पैरों को याने पिछले धड़ को किसी लकड़ी ,पाट,वृक्ष आदि के सहारे स्थिर किया जाये । फिर रोगी के रोग के स्थान को नीम के उबले हुऐ कुनकुने पानी से सावधानी के साथ धोया जाय । इससे अंग नर्म होगा और उसे बैठाने में आसानी होगी। इसके बाद इस अंग पर देशी शराब का छिड़काव देकर सावधानी के साथ उस भाग को धीरे-धीरे हाथ ऊपर से नीचे घुमाकर यथास्थान बैठाना चाहिऐ । फिर उसे पतली रस्सी का फन्दा बनाकर बाँध देना चाहिऐ, जिससे दुबारा बाहर न आ सकें ।

८ – औषधि – योनिभ्रशं रोग- सूर्यमुखी का फूल १६०तोला या १९२०ग्राम, पानी १० लीटर , फूल को बारीक कूटकर पानी में ख़ूब उबाला जाय ।फिर कुनकुने पानी को छानकर अंग को धोना चाहिऐ । उसके बाद माजूफल दो तोला ( २४ ग्राम ) महीन पीसकर अंग पर छिटक देना चाहिऐ ।फिर हाथ द्वारा सावधानी से अंग को ऊपर नीचे की ओर घुमाकर यथास्थान बैठाना चाहिऐ ।
अंग को बैठाने से पहले हाथ के नाख़ून काट लें ,छल्ला या अँगूठी उँगली में होतों उसे निकाल देना चाहिऐ । हाथ में घी या तैल जैसा चिकना पदार्थ लगाकर, अंग को सावधानी से धीरे-धीरे बैठाया जाऐ । रोगी के जीने मे १० तोला ( १२० ग्राम ) डाली जाये। तथा कालीमिर्च ३० ग्राम , घी २४० ग्राम ,मिर्च को पीसकर कुनकुने गरम घी में मिलाकर , रोगी को दोनों समय ४ दिन तक , नाल या बोतल द्वारा पिलाया जाये ।

९ -औषधि – योनिभ्रशं रोग – दही ४८० ग्राम ,घृतकुमारी का गुदा २४० ग्राम ,पानी २४० ग्राम ,गूदे को दही में मथकर ,उसमें पानी मिलाकर ,रोगी पशु को पिलाया जाय ।
१० -औषधि – मसूर की दाल ६० ग्राम , दही ९६० ग्राम , मसूर की दाल को तवे पर जलाकर ,पीसकर ,छानकर ,दही में मथकर पानी में मिलाया जाय । फिर रोगी पशु को दोनों समय पिलाया जाय ।
११ – औषधि – गाय का घी २४० ग्राम ,माजूफल २ नग , माजूफल को पीसकर ,कुनकुने घी में मिलाकर , रोगी पशु को ५ दिन तक पिलाया जाय। यह दवा दोनों समय देनी चाहिऐ ।

१० -औषधि – इस रोग की आशंका होतों पशु को कालीमिर्च और घी वाली दवाई देना लाभदायक होगा ।इससे प्रसव में कठिनाई नहीं होगी । इसके आलावा २ चिकनी सुपारियाँ को जला लें और उस राख को १२० ग्राम घी में मिलाकर इसी मात्रा में सुबह ,शाम और रात्रि में तीन बार पिलायें ।
टोटका -:-
११ -औषधि – योनिभ्रशं रोग- सत्यनाशी के तने का रस तथा पत्तियों का रस निकालकर कपड़े में छान लें और बारीक कपड़ा रस में भिगोकर बैठी हुई गाय के बाहर निकले गर्भाशय पर चिपकाकर ढक दें ,तुरन्त ही गर्भाशय अन्दर चला जाता है और अपने आप सैट हो जायेगा और फिर कभी बाहर नहीं आयेगा । और गाय ठीक हो जायेगी ।

१2 – औषधि – योनिभ्रशं रोग ,दतना, बेल बाहर आना,( गाभिन गाय की योनि से बैठते ही बच्चा बाहर की ओर निकलना ) – चूना – १ किलो , पाँच किलो पानी में उबालकर ,ठन्डा कर, बीच- बीच में हिलाते रहे तीन दिन तक । और तीसरे दिन पानी को निथार कर ५० M L पानी एक माह तक रगुलर देनें से लाभ होता हैं । यह रोग यदि कैल्शियम की से हुआ तो ठीक होगा । नहीं तो गाय जहाँ पर बँधती है कही वह फर्श ढालदार तो नहीं ,क्योंकि गाभिन गाय को समतल फ़र्श पर ही बाँधते है ।

१3 – औषधि – योनिभ्रशं रोग गाय- भैंस को– छोटी दूद्धी ( हजारदाना ) को उखाड़ कर धोकर उसका रस निकाल लें,एक नाल भरकर प्रतिदिन सुबह सायं ३-४ दिन तक देवें , अधिक से अधिक ८ दिन दवाई दें, यदि रस्सीकी कैची बाँधने की स्थिति में भी दवाई अच्छा काम करती है । 

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