27- गौ- चिकित्सा – (पेटरोग-अजीर्ण रोग)

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27 गौ- चिकित्सा – पेटरोग-अजीर्ण रोग।

1 – अजीर्ण – पेटरोग
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कारण व लक्षण – पित्त, जल , या कठोर भोजन करने से यह बिमारी उत्पन्न होती हैं , पेट में भंयकर दर्द भारीपन , गुडगुहाट , साँस लेने में कष्ट का अनुभव करता है तथा जूगाली नहीं कर पाता हैं , दाँत किटकिटाना इसका प्रमुख लक्षण हैं तथा गोबर पशु या तो करता नही हैं और यदि करता भी हैं तो अत्यन्त दुर्गन्धपूर्ण व कच्चापक्का करता हैं ।
इस रोग में पशु का पेट फुलाता नहीं हैं किन्तु बायीं ओर कुछ भारीपन मालूम होता हैं । पेट पर अंगुली मारने से ढब – ढब शब्द की आवाज़ नहीं आती हैं , ब्लकि पेट कठोर मालूम होता हैं । इस बिमारी में पशु गोबर करता ही नहीं हैं । और अगर करता भी हैं तो खायी हूई वस्तु का कच्चा अंश आने लगता हैं । पशु कभी – कभी नथुनों को ऊपर खिंचता हैं तथा ज़मीन पर दाढ़ी रखता हैं और गले से घों – घों शब्द की आवाज़ आती हैं । कभी – कभी पशु दाहिनी करवट से लेटना चाहता हैं ।

# – पेट फुलने और अजीर्ण में एक विशेष अन्तर हैं कि पेट फुलने पर रोगी पशु बेचैन रहता हैं । अजीर्ण रोग का रोगी पशु बेचैन नहीं रहता ब्लकि चुपचाप लेंटा रहता हैं ।

# – अजीर्ण में पशु को कुछ दिनों तक खाना नहीं देना चाहिए यदि आवश्यक हो तो हरा मुलायम घास व चावल का माण्ड देना चाहिए । इसके आलावा दलिया चोकर व जल्दी पचने वाला चारा ही देना चाहिए ,
क़ब्ज़ व दर्द व पेट सम्बन्धी दवाएँ देते रहना चाहिए तथा अजीर्ण में जूलाब देकर ही अन्य दवाएँ देना चाहिए व दवायें समयानुसार देना चाहिए ।

१ – औषधि – जूलाब , विरेचन विधी – अलसी का तेल ५० ग्राम , मुसब्बर १०० ग्राम , दोनों को पर्याप्त मात्रा में चूल्हे पर पका लें । जब जब वह भलीप्रकार घूल जायें तब उसमें २-३ जमाल घोटें की गीरी डाल दें और आवश्यकतानुसार गन्ने की शीरा मिला लें इसके बाद रोगी पशु की ताक़त के अनुसार देवें । इस दवा से उनका पर्याप्त मल ( गोबर ) बाहर आ जायेगा लेकिन ध्यान रहें की जमालघोटा की गीरी तीन से ज़्यादा नहीं होनी चाहिए वरना लेने के देने पड़ जायेंगे ।
उपचार- औषधियाँ :- कालीमिर्च १५ ग्राम , भांग पावडर १५ ग्राम , ज़ीरा पावडर ९० ग्राम , पुराना गुड़ १०० ग्राम , देशी शराब १२५ मिलीग्राम , गरमपानी १५०० ग्राम , में मिलाकर पशु को दिन में तीन – चार बार पिलायें ।
२ – औषधि :- बड़ी बच १० ग्राम , कालीमिर्च १० ग्राम , अजमोदा १० ग्राम , हींग १० ग्राम , सेंधानमक १० ग्राम , चने का आटा १०० ग्राम , सभी को मोटा – मोटा कुटकर चने के आटे में मिलाकर गोलियाँ बनाकर रखँ लेंवे , इन गोलियों को दिनभर में आवश्यकतानुसार देनें से लाभ होता है।

३ – औषधि :- सरसों या तिल का तेल ५०० ग्राम , तारपीन तेल २५ ग्राम , मिलाकर नाल द्वारा पिलानें से लाभ होता हैं ।

४ – औषधि :- सोंठ पावडर ५ ग्राम , अरण्डी का तेल ५०० ग्राम , मिलाकर नाल द्वारा पिलाने से लाभ होता हैं ।
५ – औषधि :- अजीर्णहारी चूर्ण २५-३० ग्राम , रोगी को देते रहने से वह स्वस्थ हो जाता है तथा अन्य रोगों का शिकार होने से बचा रहता है ।

अजीर्णहारी चूर्ण बनाने की विधी — हल्दी , राईदानें , हींग , सफ़ेद ज़ीरा , काला ज़ीरा , त्रिफला , कालानमक , सेंधानमक , सहजन ( सोहजना ) छाल , त्रिकुटा , अजवायन , सुहागा खील ,फिटकरी खील , चीता , कचरी , बच , बायबिड्ंग , जवाॅखार , सज्जीखार , प्रत्येक वस्तु को समान मात्रा में लेकर कुटपीसकर छानकर रख लें आवश्यकता पड़ने पर पशुओं को देंने से लाभँ होता है ।

६ – औषधि – सेंधानमक , अजवायन , भाँग , नागोरी अश्वगन्धा प्रत्येक को २५०-२५० ग्राम , सोंचर नमक ५०० ग्राम , सांभर नमक सवाकिलो, खुरासानी अजवायन ( अजमेंदा ) ओर सज्जी २५०-२५० ग्राम , इन सबको कूटछानकर बराबर मात्रा में चने के आँचें में मिलाकर रखँ लें १० ग्राम की मात्रा में प्रात: काल पशु को दें इससे लाभँ होगा ।

२ – अपचन
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कारण व लक्षण – पशुओ में अपचन की बिमारी के कई कारण होते है -पशु कभी-कभी लालच वंश अधिक खा जाता है, जिससे उसे अपचन या बदहजमी हो जाती है । सडा- गला और गन्दा चारा, दाना खाने से भी अपचन का रोग हो जाता है । पशु कभी-कभी अधिक कमज़ोर हो जाने पर अधिक खा जाता है, परन्तु हज़म न कर पाने के कारण उसे अपचन रोग हो जाता है ।
जब पशु सुस्त एवं चिन्तित मालूम होता है । दिन प्रतिदिन वह अधिकाधिक कमज़ोर होकर सूखता चला जाता है । दूधारू पशु के दूध देने की मात्रा दिनोंदिन घटती जाती है । जूगाली करने में अनियमितता होती है। वह पानी अधिक पीता है । वह मोटा, पर्तदार , सूखापन लिये हुए लेंड़ी की तरह गोबर करता है गोबर करते समय कभी – कभी वह कराहता है। कभी – कभी वह बदबूदार पतला गोबर करता है, उसके मुँह से दुर्गन्ध आती है।

१ – औषधि – मीठा तैल ३६० ग्राम , हींग १२ ग्राम , पानी ४८० ग्राम , काला नमक ६० ग्राम , सबसे पहले पानी को गरम करें । फिर काला नमक महीन पीसकर खौलते पानी में डाल दें और उसे कुछ देर तक उसी में पड़ा रहने दें । जब पानी लगभग ३५० ग्राम , रह जायें तो उसे उतार लें । और उसमें तैल डाल दें । फिर इस घोल को दो बर्तनों के द्वारा ख़ूब फेंट लें । इस तरह घोल कुछ गाढ़ा हो जायेगा । गुनगुने होने पर उसे रोगी को सुबह – सायं रोज़ाना ठीक होने तक पिलाते रहें ।

२ – औषधि – इन्द्रायण २४ ग्राम , गुड़ २४० ग्राम , आँबाहल्दी ६० ग्राम , कंटकरंज ३० ग्राम , फिटकरी २४ ग्राम , पानी ९६० ग्राम , सेंधानमक ६० ग्राम , सबको महीन पीसकर पानी में उबाल दें , फिर दवा ६०० ग्राम , रहने पर रोगी पशु को गुनगुना रहने पर बिना छाने बोतल द्वारा पिला दें । यह दवा रोज़ाना सुबह- सायं ठीक होने तक पिलाते रहें ।

३ – औषधि – बत्तीसा चूर्ण १८० ग्राम , पानी ७२० ग्राम , पानी को नमक डालकर गरम करना चाहिए । फिर नीचे उतारकर घुड़बच को महीन पीसकर उसमें मिला दें । गुनगुना रहने पर रोगी पशु को रोज़ाना सुबह- सायं ठीक होने तक पिलाते रहें ।

४ – औषधि – घुड़बच १२० ग्राम , नमक ९६ ग्राम , पानी ७२० ग्राम , पानी को नमक डालकर गरम करना चाहिए, फिर नीचे उतारकर घुड़बच को महीन पीसकर उसमें मिला दें, गुनगुना रहने पर रोगी पशु को पिला दें ।सुबह – सायं रोज़ाना ठीक होने तक पिलाते रहें।

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३ – दस्त लगना
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अजीर्ण एवं अपन के कारण पशु को कभी – कभी दस्त लग जाते हैं । पशु इस रोग में बार- बार पतला गोबर करता है । पशु कमज़ोर हो जाता है । वह बार- बार थोड़ा – थोड़ा पानी पीता हैं।

१ – औषधि – रोगी पशु को हल्का जूलाब देकर उसका पेट साफ़ करना चाहिए ।रेण्डी का तैल १८० ग्राम , पीसा सेन्धा नमक ६० ग्राम , दोनों को मिलाकर गुनगुना करके रोगी पशु को पिलाया जाय ।

२ – औषधि – गाय के दूध की दही १९२० ग्राम , भंग ( भांग विजया ) १२ ग्राम , पानी ४८० ग्राम , भंग को महीन पीसकर सबको मथें और रोगी पशु को दोनों समय आराम होने तक पिलाया जाय ।

३ – औषधि – विधारा ६० ग्राम , जली ज्वार ६० ग्राम , गाय के दूध से बनी छाछ१४४० ग्राम , ज्वार को जलाकर और पीसकर छाछ में मिलाकर , रोगी पशु को दोनों समय , आराम होने तक , पिलाया जाय ।

४ – औषधि – शीशम की हरी पत्ति २४० ग्राम , पानी ९६० ग्राम , पत्तियों को महीन पीसकर , पानी में घोलकर , रोगी पशु को दोनों समय , आराम होने तक , पिलायें ।

५ – औषधि – विधारा का पेड़ ६० ग्राम , गाय की छाछ ९६० ग्राम , विधारा को महीन कूटपीसकर ,छाछ में मिलाकर , बिना छाने , रोगी पशु को दोनों समय , आराम होने तक , पिलाया जाय ।

६ – औषधि – मेहंदी १२ ग्राम , धनिया २४० ग्राम , पानी ४८० ग्राम , दोनों को बारीक पीसकर , पानी में मिलाकर , एक नयी मटकी में भरकर रख दिया जाय । दूसरे दिन सुबह उसे हिलाकर ९६०ग्राम दवा दोनों समय दें । तीसरे दिन ४८० ग्राम , के हिसाब से ,दोनों समय आराम आने तक यह दवा पिलाते रहे ।

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४ – पटामी रोग ( दस्त रोग )
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गर्मी के दिनों में यह रोग अक्सर होता है । सूर्य की तेज़ गर्मी के कारण यह रोग उत्पन्न होता है । रोगी को पतले दस्त लगते हैं । उसका गोबर बहुत ही दुर्गन्धपूर्ण और चिकना होता है । गोबर के साथ ख़ून और आँते गिरती हैं । रोगी पशु सुस्त और बहुत कमज़ोर हो जाता है । वह खाना – पीना , जूगाली करना बन्द कर देता है । उसके ओढ़ सूख जाते हैं ।

१ – औषंधि – नीम की हरी पत्ती २४० ग्राम , गाय का घी ३६० ग्राम , पत्तियों को पीसकर उनका गोला बना लें और रोगी पशु को हाथ से खिलाना चाहिए । उसके बाद घी को गुनगुना गरम करके पिलाया जाय । अगर पत्तियों को हाथ से न खाये तो उसको पानी में घोलकर बोतल द्वारा पिला देना चाहिए ।दवा दोनो समय ठीक होने तक पिलाना चाहिए ।

२ – औषधि – अरणी की पत्ती १८० ग्राम , ठन्डा पानी ९६० ग्राम , पत्तियों को महीन पीसकर , पानी में मिलाकर , बिना छाने , रोगी पशु को दोनों समय , आराम होने तक , पिलाया जाय ।

३ – औषधि – विधारा के पेड़ १२० ग्राम , गाय के दूध से बनी दही १४४० ग्राम , पानी ९६० ग्राम , बेल को महीन पीसकर , छलनी द्वारा छानकर , दही और पानी में मथकर रोगी पशु को दोनों समय ,आराम होने तक पिलाना चाहिए ।
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५ – पेचिश
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कारण व लक्षण – बदहजमी के कारण अक्सर यह रोग हो जाता है । पशु को ज़्यादा दौड़ाने से भी यह रोग हो जाता है । रोगी पशु बार- बार गोबर करने की इच्छा करता है और वह थोड़ा – थोड़ा रक्तमिश्रित पतला गोबर करता है। और गोबर के साथ उसकी आँते भी कट-कटकर गिरती है ।

१ – औषधि – मरोडफली १२० ग्राम , सफ़ेद ज़ीरा १२० ग्राम , गाय के दूध से बनी छाछ ९६० ग्राम , उपर्युक्त दोनों चीज़ों को बारीक पीसकर ,छाछ में मिलाकर ,दोनों समय आराम होने तक ,पिलाया जाय ।

२ – औषधि – कत्था १२ ग्राम , भांग,विजया १२ ग्राम , बिल्वफल , बेल के फल का गूद्दा १२० ग्राम , गाय के दूध से बनी दही ९६० ग्राम , पानी ४८० ग्राम , कत्था और भांग को बारीक पीसकर , बेल का गूद्दे को पानी में आधे घन्टे पहले गलाकर , उसे मथकर , छान लिया जाय , फिर दही और सबको मिलाकर मथ लिया जाय। रोगी पशु को दोनों समय , आराम होने तक पिलाया जाय ।

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६ – पेट का फूलना
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कारण व लक्षण – सडागला चारा – दाना खा लेने से अक्सर पशु का पेट फूल जाता है । वर्षा – ऋतु के शुरू में लालचवश हरा चारा खा लेने से भी पेट फूल जाता है । समय- समय पर पानी न मिलने पर या खाने के बाद एकदम अधिक श्रम करने पर भी पशु का पेट फूल जाता है । कभी- कभी दाने में चूहे की लेंडी ( चूहे की मिगंन ) खा लेने से भी पेट फूल जाता है ।
पशु बेचैन रहता है । वह अपनी बायीं कोख की ओर देखता रहता है । उसका पेट फूल जाता है । फूली हुई कोख को दबाने से पीली – पीली ढोल की भाँति आवाज़ आती है । पेट में गैस भर जाती है । पशु बार- बार उठता – बैठता है ।

१ – औषधि – अम्बर बेल ( विटीश करनोसा ) ६० ग्राम , नमक ६० ग्राम , गाय के दूध से बनी छाछ १४४० ग्राम , बेल को महीन कुटकर , छाछ में नमक मिलाकर , गला देना चाहिए । २५ मिनट बाद उसे छानकर , रोगी पशु को सायं – सुबह , पिलाते रहना चाहिए ।

२ – औषधि – इन्द्रायण , कडवी कचरी १ नग ,काला नमक ६० ग्राम , अलसी का तैल ४८० ग्राम , हींग ६ ग्राम , सबको बारीक कूटकर , तैल में मिलाकर , गरम करके , गुनगुना रहने पर , बिना छाने ही दें । एक बार में आराम न हो तो दूसरी बार इसी मात्रा में पिलाया जाय । आराम अवश्य होगा ।

३ – औषधि – अरण्डी का तैल २४० ग्राम , काला नमक पीसकर ६० ग्राम , दोनों को मिलाकर गरम करके , गुनगुना होने पर , रोगी पशु को , बोतल द्वारा , पिलाया जाय ।

४ – औषधि – इन्द्रायण, कडवी कचरी १ नग , कालानमक ३० ग्राम , बकरी का पेशाब ९६० ग्राम , कडवी कचरी को महीन कूटकर , नमक और तैल मिलाकर , उसे गरम करना चाहिए । फिर गुनगुना होने पर रोगी पशु को सुबह – सायं िपलाना चाहिए ।

५ – औषधि – मेंढासिगीं ६० ग्राम , सेंधानमक ६० ग्राम , अजवायन ३० ग्राम , पानी ७२० ग्राम , सबको महीन पीसकर , पानी में मिलाकर , गरम करके गुनगुना ही रोगी पशु को बिना छाने , पिलाना चाहिए । पुराना रोग होने पर यही दवा एक बार अच्छे होने तक रोज़ पिलायी जाय ।

६ – औषधि – नमक ६० ग्राम , गोमूत्र १४४० ग्राम , दोनों को मिलाकर , गुनगुना करके , पशु को सुबह – सायं , आराम होने तक , पिलाया जाय ।

७- औषधि – नमक १८० ग्राम , पानी १४४० ग्राम , दोनों को मिलाकर , गुनगुना करके , रोगी पशु को सुबह – सायं आराम होने तक , पिलाया जाय ।

आलोक -:- जिस पशु को यह बिमारी हो उसे २४ घन्टे तक चारा नहीं देना चाहिए । उसे केवल पानी पिलाना चाहिए । बाद में हल्की पतली खुराक देनी चाहिए । और अधिक पेट फूलने पर कभी – कभी पशु की बायीं कोख में बड़े इन्जैकशन की सुई लगाने से पेट की गैस निकलेगी ।

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७ – बछड़ों को दूध के दस्त होना
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कारण व लक्षण – अपचन और अधिक दूध पीने से , अचानक चोट लगने से ,यह बिमारी हो जाती है । छोटे बछड़ों को जब तक वे घास न खायें , तब तक उन्हें पानी नही ं पिलाना चाहिए । नहीं तो उन्हें दस्त लग जाते है । रोगी बछड़े बार – बार सफ़ेद रंग के पतले दस्त करते रहते हैं । दस्त से दुर्गन्ध आती है । बछड़े सुस्त रहते हैं । उन्हें बुखार भी रहता हैं ।

१ – औषधि – हटानी लोध्र ( महारूख , महावृक्ष की अन्तरछाल ६० ग्राम , गाय का दूध २४० ग्राम , छाल को बारीक कूटकर , दूध में मिलाकर , आधा घन्टे तक पड़ी रहने दें । फिर उसे निचोड़कर , छानकर ,रोगी बच्चे को दोनों समय ,आराम होने तक पिलायें ।

२ – औषधि – कालीमिर्च १२ ग्राम , गाय के दूध से बनी छाछ १२० ग्राम , कालीमिर्च को बारीक पीसकर , छाछ में मिलाकर , बिना छाने , दोनों समय रोगी को अच्छा होने तक पिलाया जाय।

३ – औषधि – मुद्रपर्णी ( खाखर बेली ) का पुरा पौधा ३६ ग्राम , गाय के दूध से बनी छाछ १२० ग्राम ,बेली को बारीक पीसकर , छाछ में मिलाकर , रोगी पशु बच्चे को , दोनों समय , बिना छाने आराम होने तक , पिलायें ।

४ – विधारा के पेड़ ३६ ग्राम , गाय के दूध से बनी छाछ १२० ग्राम , विधारा को पीसकर , छाछ में मिलाकर , रोगी बच्चे को , दोनों समय बिना छाने दें ,आराम आने तक देवें ।

५ – औषधि – ज्वार का आटा १२० ग्राम , गाय के दूध से बनी छाछ ३६० ग्राम , ज्वार के आटे का छाछ में मिलाकर , दोनों समय , ऊपर लिखी मात्रा में रोगी बच्चों को , आराम आने तक पिलायें ।

६ – औषधि – रोगी बच्चा जब माता का दूध पीता हो तभी पीछे से उसकी पूँछ खींचकर मूँह से थन छुड़ा देना चाहिए । ऐसा ४-५ बार लगातार , दोनों समय , आराम होने तक , करना चाहिए ।

# – रोगी पशु की पूँछ में झटका न मारें और नहीं खींचें वर्ना उखड़ जाने का भय रहता है जिससे रोगी बच्चे को और अधिक पीड़ा होगी ।

७ – औषधि – रोगी बच्चे की पूँछ की जड़ पर चार तहवाला कपड़ा लपेटकर , ऊपर से सुती से या पतली डोरी से कसकर बाँध देना चाहिए ,जिससे उससे दस्त बन्द हो जायँ । दस्त बन्द होने के बाद उस डोरी को खोल देना चाहिए ।

८ – औषधि – यदि रोगी मादा बच्चा हो उसके मूत्राशय के नीचे और रोगी नर बच्चा हो तो उसके मलद्वार के नीचे एक पतला ३ इंच लम्बा आड़ा दाग दागनी द्वारा लगाना चाहिए । 

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