गाय का महत्त्व (भाग -3)

भारत में गोवध् मुसलमानों के आने के बाद और विशेषकर अंग्रेजों की हकूमत होने पर प्रारम्भ हुआ। पहले गोवध् नाम को भी नहीं था। मुसलमानों ने भी उस समय गोवध् नहीं के बराबर किया। मुगल बादशाहों ने गोवध् कानूनन अपराध् बनाया था। अंग्रेज के आने के बाद, विशेषकर अपने राज्य की नींव पक्की करने को जब उन्होंने मुसलमानों और हिन्दुओं को लड़ाने हेतु गौ का वध् करने के लिए मुसलमानों को अ​िध्काध्कि उकसाया, इससे हिन्दुओं ओर मुसलमानों में विरोध् बढ़ता गया।
ज्स्टिस कुलदीप सिंह की बैंच के समाने जब बंगाल का केस आया तो मुसलमानों से प्रमाण मांगा गया कि उनके किस ग्रंथ में बकरर्इद पर गोवध् करना अनिवार्य बताया गया है। कोर्इ प्रमाण न दिए जाने पर न्यायमूर्ति ने निर्णय दिया कि बकरर्इद पर भी गोहत्या नहीं हो सकती। परंतु वहां की साम्यवादी सरकार उच्चतम न्यायालय की खण्डपीठ के निर्णय का भी पालन नहीं करवा रही है। कलकत्ता में गोरक्षकों को गिरफ्रतार किया जाता है और गोहत्यारों को बकहर्इद पर गोहत्या करने की खुली छूट दी जाती है। केरल में तो गोरक्षा का कोर्इ कानून ही नहीं है। भारत के बड़े राज्यों में यही एक मात्रा ऐसा राज्य है जहां गोरक्षा का कोर्इ कानून नहीं है।
गोरक्षा कार्य के तीन प्रमुख पहलू हैं। गौओं की रक्षा करना उनको कत्लखानों में जाने से रोकना तथा मांस निर्यात बंद कराना। विश्व हिन्दू परिषद् के गोरक्षा विभाग ने 20 मार्च 1999 वर्ष प्रतिपदा से गोरक्षा वर्ष मनाया। राज्यों की सीमाओं पर बजरंग दल और गोरक्षा कार्यकताओं ने चौकियां बनाकर अवैध् गो निकासी को रोका। लगभग डेढ़ लाख से अध्कि गोवंश की इस प्रकार रक्षा करके उनको गोशालाओं में रखा गया और उसी वर्ष सौ के लगभग नए गोसदनों की स्थापना भी की गर्इ। उसके बाद से नर्इ गोशालाओं की स्थापना तथा अवैध् निकासी रोकने का कार्य बजरंग दल, गोरक्षा कार्य कार्यकर्ताओं और हिन्दू समाज के अन्य लोगों द्वारा हो रहा है।
गोरक्षा कार्य स्वतंत्राता प्राप्ति पूर्व से इस देश में हो रहा है। इस संदर्भ में स्वामी कापात्राी जी महाराज, भार्इ हनुमान प्रसाद पोद्दार, प्रभुदत्त जी ब्रह्माचारी, लाला हरदेव सहाय, जैन मुनि सुशील कुमार, जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी निरंजन देव तीर्थ, जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी कृष्णबोधश्रम, स्वामी रामचन्द्र वीर और उनके पुत्रा महाराज ध्र्मेन्द्र जी, आचार्य विनोबा भावे जिन्होंने आपात् काल में आमरण अनशन किया और प्रधनमंत्राी इन्दिरा गांध्ी ने झूठा आश्वासन देकर उनका अनशन समाप्त करा दिया, प्रभृति महानुभावों के नाम उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए चिरस्मरणीय रहेंगे।
सन् 1950 में केवल चार सप्ताह में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवकों ने पौने दो करोड़ से अध्कि हस्ताक्षर कराए। संघ के द्वितीय सरसंघचालक
पूजनीय माध्वराव सदाशिवराव ;गुरुजीद्ध गोलवलकर उन हस्ताक्षरों को गोवबन्दी की मांग के साथ उस समय के राष्ट्रपति डाक्टर राजेन्द्र प्रसाद को सौंपकर आए, परन्तु कोर्इ सकारात्मक परिणाम नहीं निकला।
5 नवम्बर 1966 को लाखों लोगों ने पूज्य सन्तों, महन्तों, ध्र्माचार्यो के नेतृत्व में भारत के संसद भवन पर विशाल प्रदर्शन किया। उसे उपरान्त विशाल जनसभा भी वहां हुर्इ। इन्दिरा गांध्ी की सरकार ने कुछ गुण्डों से सभा में गड़बडी कराके बिना चेतावनी दिए लाठीचार्ज, अश्रुगैस एवं गोलीवर्षण किया जिसमें सैंकड़ों गौभक्त शहीद हुए और हजारों घायल हो गए। यह प्रदर्शन उस समय तक का विशालतम प्रदर्शन था।
1925 में विश्व हिन्दू परिषद् का गठन हुआ। गोहत्या बन्दी और गोपालन के लिए दो पंजीकृत संस्थाएं भारतीय गोवंश रक्षण संवर्ध्न परिषद् तथा गोहत्या एवं मांस निर्यात निरेाध् परिषद् गठित की गर्इ। गोरक्षा आन्दोलन को योजनाब( ढंग से चलाने के लिए 25 पफरवरी, 1956 को नर्इ दिल्ली के कांस्टीच्यूशन क्लब में न्यायमूर्ति गुमान मल लोढ़ा की अèयक्षता में सभा हुर्इ। राष्ट्रीय गोरक्षा आन्दोलन समिति का लोढ़ा जी की अèयक्षता में गठन किया गया। सर्वसम्मति से पूर्ण गोवंश हत्या बन्दी का संकल्प लिया गया।
सम्वत् 1953 के बाद बजरंग दल, गोरक्षा कार्यकर्ता तथा अन्य भी हिन्दू समाज के संवदेनशील बंध्ुओं द्वारा गोवंश के अनुचित निकास हो रोका हो रहा है। भारत के उत्तरांचल, पश्चिमांचल और मèय क्षेत्रा के अतिरिक्त अन्य राज्यों में भी नर्इ गोशालांए निर्माण हो रही है। उदाहरणार्थ केरल में भी जहां गोरक्षा का कोर्इ कानून तक नहीं है, नर्इ गोशाला का निर्माण हुआ है। ऐसा ही हिमाचल में भी हुआ है। गोशालाओं तथा हिन्दू समाज के बंध्ुओं द्वारा अ​िध्काध्कि गोवंश रक्षा के प्रयास निरन्तर चल रहे हैं। साथ ही जैन सन्तों द्वारा समाज को प्ररेणा देकर नर्इ नर्इ गोशालाओं की स्थापना की जा रही है।
जैन सन्तों द्वारा विशाल सम्मेलनों के माèयम से मांस निर्यात बन्द करने का आह्वान किया जा रहा है। इस सबंध् में जैन संत तरुण सागर जी महाराज का प्रयत्न विशेषतौर पर सराहनीय है। वे दिल्ली लाल किले पर पिछले वर्षो में दो विशाल सम्मेलन कर चुके हैं। समाज द्वारा कत्लखानों, विशेषकर यां​ित्राक कत्लखानों, को बन्द करने की मांग निरन्तर की जा रही है। कत्लखानों और मांस निर्यात को किसी भी प्रकार का अनुदान देना तुरंत बंद करने की मांग हो रही है। दुर्भाग्य से 6 अप्रैल, 2000 से ओपन जनरल लाइसेंस के अध्ीन, गोदुग्ध्, दुग्धेत्पादों, सेन्द्रीय खाद आदि का आयात भी होने लगा है। भारत सरकार ने इस प्रकार के आयातों पर 40 प्रतिशत आयात शुल्क लगाना तय किया है ताकि भारत के इन उत्पादों द्वारा बाजार में विदेशी आयातों से सपफल स्पर्ध की जा सके। वास्तव में भारत में इन वस्तुओं का आयात होना ही नहीं चाहिए।
भरसक प्रयत्न करने पर भी गोवंश हत्या बन्द नहीं हो रही है, अपितु गोवंश हत्या उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही है। स्वामी विवेकानंद जी कहते थे, ‘‘यदि किसी समस्या को सुलझाना है तो उसमें जड़ से सुधर करना चाहिए।’’ स्वाध्ीनता के पूर्व और उसके पश्चात् भी गोवंश हत्या की जड़ में विकृत सोच रही है। गोवंश हत्या को प्रोत्साहन देने वाली प्रशासनिक नीति बदलने की आवश्यकता है। भारत सरकार, यहां की राज्य सरकारें तथा न्यायालय भी ठीक विचार से नहीं चल रहे है। ये सोचते हैं कि गोवंश बूढ़ा होने पर दूध् नहीं देता तथा हल चलाने और बोझ ढोने में अक्षम हो जाता है। अत: अनुपयोगी हो जाता है। यह सोच अत्यन्त विकृत है क्योंकि जीते जी गोवंश गोबर गोमूत्रा देगा ही। उसके सदुपयोग से भारतीय कृषि लाभान्वित होने के अतिरिक्त मनुष्य स्वास्थ्य भी सुधर कर सकता है।
क्ेवल जीते जी ही नहीं, मरणोपरान्त भी गोवंश उपयोगी रहता है उसके चमड़े, हड्डियों, सींगों यहां तक कि सारे शरीर का ही उपयोग खेती के लिए हो सकता है। आजकल के विशेषज्ञों की यह सोच कि दूध् न देने वाले गोवंश का वध् करके तथा हल चलाने और बोझ न ढो सकने वाले बैलों को मारकर चारे की कमी को पूरा किया जा सकता है, ठीक नहीं है। गोवंश के मांस को खाद्यान्न पूर्ति हेतु उपयोग में लाना चाहिए, ये भी विकृत विचार है। यह विचार कि गोवंश के चरने से जंगलों की हानि होती है, ठीक नहीं है। वास्तव में गोवंश के लिए अध्कि चारागाहें चाहिए।
मंस निर्यात से आय की प्राप्ति और विदेशी मुद्रा की कमार्इ भी न्यायसंगत नहीं है। यह कहना कि गोवंश हत्या से देश को आर्थिक लाभ होता है, गोवंश हत्या इस कारण देश के हित में है और गोवंश हत्या रोकना देश के विरोध् में है, ठीक नहीं है। प्रशासनिक अ​िध्कारी गोहत्या के पक्ष में इस प्रकार की दलीलें देकर गोवंश हत्या बन्द नहीं होने दे रहे। उनकी दलीलें वास्तविकता के विरू( हैं।
गोरक्षा का दूसरा प्रमुख पहलू है, गोवंश का ठीक परिपालन। गोवंश को ठीक चारा, दाना, पानी मिलना चाहिए। उनके लिए मनुष्य के समान सन्तुलित आहार आवश्यक है। उनके रहने का स्थान स्वच्छ, सापफ-सुथरा होना चाहिए। सर्दी, गर्मी में ठीक सुरक्षा का प्रबंध् होना चाहिए। एक गौ या बैल को बैठने और खड़ा होने का पर्याप्त स्थान चाहिए। उनको ठीक प्रकार से चारा दाना खिलाने का प्रबंध् करना चाहिए। पीने का पानी स्वच्छ और ठीक व्यवस्था के अनुसार हो।
उनके लिए चारा भण्डार की ठीक व्यवस्था हो ताकि वर्ष भर चारे की कमी न हो। हरा चारा मिलना आवश्यक है। अलग आयु के बछड़े-बछड़ियों के रहने और खाने का प्रबंध् अलग-अलग होना चाहिए। दूध् देने वाली और दूध् न देने वाली गौओं की व्यवस्था अलग से हो। बैलों और सांडों की
व्यवस्था भी अलग हो। बीमार गौओं का प्रबंध् अलग करके उनके लिए ठीक डाक्टरों और दवादारू की व्यवस्था होनी चाहिए।
संक्रामक रोगों की रोकथाम और संरक्षण का ठीक प्रबंध्न होना चाहिए। पशुओं को ठीक समय पर ठीक टीके लगने चाहिएं। गलघोट्, गिल्टी, अनेक प्रकार के बुखार, मुंहपका, खुरपका बीमारियों का ठीक उपचार, पोका-पोंकनी ;रिण्डरपेस्टद्ध आदि रोगों का ठीक निदान और र्इलाज ठीक समय से होना चाहिए। बीमारी की हालत में पशु के मुंह से लार अन्य पशुओं को न छुए। संसर्गी गर्भपात से भी पशु की रक्षा होनी चाहिए। बीमार पशुओं और स्वस्थ पशुओं के बर्तन भी अलग अलग रहने चाहिए।

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