गाय का महत्त्व (भाग -4)

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गाय का महत्त्व (भाग -4)

भारतीय गोवंश के चरने के लिए गोचर भूमि की व्यवस्था आवश्यक है। घूम फिर कर स्वंतत्राता से चरकर गोवंश के पालने का खर्च कम हो जाता है और वह प्रसन्न रहता है। चारागाह में चरने से उसके दूध् की मात्रा बढ़ जाती है। चारगाहों की व्यवस्था सापफ सुथरी हो। पालक वहां गन्दगी लेकर न जांए। आज देश की चारागाहें नष्ट प्राय हो गर्इ है। उनका कुछ वैकल्पिक उपयोग चारागाहों के स्थान पर उद्योगों का खड़ा होना या मकान बनाना ठीक नहीं है।
गोवंश के गोबर का पूर्ण उपयोग करने के लिए आवश्यक आकार के गोबर गैस संयंत्रा लगने चाहिए। गैस का र्इंध्न, चालक शक्ति और बिजली निर्माण के लिए ठीक उपयोग होना चाहिए। गैस निकली स्लरी खाद निर्माण के लिए पूर्ण गोबर की अपेक्षा अध्कि उपयोगी होती है। गैस से चूल्हे जलाए जा सकते हैं। चारा काटने की मशीनें चलार्इ जा सकती है। सामान्य यंत्राों की सहायता से छोटे पैमाने पर बिजली निर्माण करके आस पास के क्षेत्रा में बिजली की कमी की कुछ मात्राा में पूर्ति की जा सकती है।
देसी खादें तैयार करके रासायनिक खादों की हानियों से बचा जा सकता है। इन खादों से भूमि बंजर होती जाती है और हर बार खाद की अध्कि आवश्यकता होने से पफसल की लागत बढ़ती जाती है। इन खादों की उपयोग से अ​िध्काध्कि कीड़ों के प्रकोप से बचने के लिए महंगे कीटनाशक डालने पड़ते हैं। इन दोनों के उपयोग से उत्पादों में विष बढ़ता जाता है, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकर सि( होता है। रासायनिक खादों और कीटनाशकों के उपयोग के कारण भारतीय माता के दूध् में भी 20 प्रतिशत से अध्कि विष आ गया है। आगामी पीढ़ियों की स्थिति का इससे अनुमान किया जा सकता है।
गोमूत्रा संसार का सर्वोत्तम कीटनियंत्राक है, खाद भी है। गोमूत्रा में आक, नीम, तुलसी आदि के पत्त्ो डालकर उसे बढ़िया कीटनियंत्राक तैयार किये जा सकते हैं। गोमूत्रा में कर्इ गुना पानी मिलाकर भी उसे पफसलों पर छिड़कने से उत्पादन, उसकी गुणवत्ता में बहुत लाभ होता है। विष रहित स्वस्थ पफसलें
प्राप्त होती हैं और औष​िध्यों का अनावश्यक खर्च बच जाता है।
गोबर-गोमूत्रा से सभी पेट की व्या​िध्यों का सपफल उपचार होता है। कैंसर, हृदय रोग, गुर्दा रोग, टीñ बीñ जैसी भीषण बीमारियों का इलाज हो रहा है। स्वस्थ और देसी गाय का गुर्दा गंगाजल के समान है। सबसे बढ़िया गोमूत्रा बिना ब्यार्इ बछड़ी का होता है। उसको कपड़े की आठ तहों में छानकर कांच की बोतल में रखना चाहिए।
इस देश में गोवंश सम्पन्नता का द्योतक रहा है। अध्कि गोवंश का पालक अध्कि ध्नाढ्य माना जाता था। एक सम्पन्न व्यक्ति के पास लाखों गौएं होती थी। गोदान सबसे श्रेष्ठ दान माना गया। वैतरणी पार करने के लिए भी गोमाता ही एकमात्रा सहारा मानी गर्इ, अन्त में उसी की पूंछ पकड़कर उ(ार होता था।
गोरक्षा का तीसरा प्रमुख पहलू है कि भारतीय गोवंश की नस्ल सुधरी जाए। बिना नस्ल सुधरे गोवंश की रक्षा का प्रयत्न विपफल हो सकता है। नस्ल सुधर के लिए विदेशी नस्लों से भारतीय नस्ल का संकरीकरण पूरी तरह रोक देना चाहिए क्योंकि हमारी गाय ;गोवंशद्ध के गोबर, गोमूत्रा, दूध्, दही, लस्सी, मक्खन और घी में जो गुण होते हैं, वे विदेशी नस्लों में नहीं होते। अपनी ही नस्लों का क्रास ब्रीडिंग करके अपने गोवंश में और सुधर किए जाने की संभावना है। गोवंश जैसा है उसकी रक्षा तो आवश्यक है ही, परंतु गोवंश की नस्ल सुधर कर देसी गौओं का दूध् बढ़ाया जा सकता है। संभवत: एक ही ब्यांत में पूरी सपफलता नहीं मिलेगी। तीन, चार ब्यांतों तक निरन्तर प्रयत्नशील रहना होगा।
भारत की गाय को बदनाम किया जा रहा है कि वह दूध् कम देती है। वास्तव में हमने ही गौ की अवहेलना की है। भारत के गुजरात राज्य की गीर नस्ल की गाय इÏाइली लोग ले गए हैं, जो संसार में सर्वाध्कि दूध् देती है। उनका गिनीज बुक में नाम है हमें अपने गोपालकों का आत्मविश्वास बढ़ाना होगा और गोवंश की नस्ल सुधर का गाय का दूध् बढ़ाना होगा। इसके लिए पशुपालन विभाग के निदेशक, उपनिदेशक तथा अन्य दूसरे जानकर, विशेषकर सेवानिवृत्त, अ​िध्कारियों का सहयोग लेना पड़ेगा। भारत की गाय आठ दस किलो दूध् देने लगेगी तो न केवल किसान बल्कि नगरवासी भी उसको चाव से पालेंगे।
चरागाहों की रक्षा की जाने चाहिए। जो चारागाहें अभी बची हैं, उनके वैकल्पिक उपयोग तुरंत रोक देने चाहिएं। वन विभाग भी चारागाहों का ठीक उपयोग नहीं कर पा रहा है। जिन चारागाहों पर गरीब लोगों के लिए मकान बन गए हैं या किसी अमीर आदमी की पफैक्ट्री आदि बन गर्इ है और जिसे हटाया नहीं जा सकता, उनके स्थान पर सरकार और ध्नी पुरुषों को अध्कि चारागाह भूमि प्राप्त कराके चारागाहों की कमी को पूरा करना चाहिए।
जिन वैकल्पिक उपयोगों से चारागाह भूमि छुड़ार्इ जा सकती है, उसको छुड़ाना चाहिए। भारतीय गोवंश के लिए चारागाहें नितान्त आवश्यक हैं।
गोवंश के रक्षण, पालन एवं संवर्ध्न का काम कुछ थोड़े समय में सम्पन्न होने वाला नहीं है। इसके लिए लगातार गोभक्तों द्वारा प्रयत्न किए जाने की आवश्यकता है। साथ ही गोवंश रक्षण भरतीय संविधन में मूलभूत सि(ान्तों में सम्मिलित होना चाहिए, केवल मार्गदर्शक सि(ातों में इसको सम्मिलित रखना पर्याप्त नहीं है। गोवंश रक्षण को केन्द्रीय सरकार द्वारा पालन किए जाने वाले विषयों में सम्मिलित करना चाहिए। यदि यह किसी कारण अभी संभव न हो तो इसे समवर्ती सूची में तुरन्त सम्मिलित कर लेना चाहिए ताकि राज्य सरकारों के साथ साथ केन्द्र की भी गोरक्षण, पालन, संवर्ध्न की जिम्मेवारी हो जाए। आजकल संविधन संशोध्न आयोग के द्वारा यह कार्य तुरन्त और आसानी से प्रस्तावित कराके केन्द्र सरकार द्वारा इसको मान्य करना चाहिए। इस विषय को भारतीय जनता तथा सरकारों को गम्भीरता से लेना चाहिए। ऐसा करने से कृषि प्रधन देश भारत का भविष्य उज्जवल होगा।

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