॥ श्रीसौरभ्यै नमः ॥
               ॥ गो गरीमा ॥
गो सब जग की माता है, यह निश्चय है।
गो सर्व-विभक्त-दात्री है, पदम सदय है॥
गोभक्ति पतित को, पावन कर देती है।
गोसेवा करती पाप-ताप, सब क्षय है॥1.॥
गो-पावन तन में देव सभी रहते है।
ऐसा सब वेद-पुराण गो ग्रन्थ कहते है॥
माँ के समान करे न समादर गो का।
वे मूढ़ दुःखों की ज्वाला में दहते है॥2.॥
गो घास-फूस तृण-पात स्वयं रचती है।
पर दुग्ध अमृत सा वह प्रदान करती है॥
गो प्राणी मात्र का करती पालन-पोषन।
गो निबलों को कर सबल रोग हरती है॥3.॥
गो है जिस घर में, है आराम वहां पर।
गो है जिस घर में, है सुरधाम वहां पर॥
गो है जिस घर में, श्री सुख शांती वहां पर।
गो हैं जिस घर में, है गोपाल वहां पर॥4.॥
गो की सेवा से सुप्त भाग्य जग जाते।
गो की सेवा से सब दैन्य-दुःख भग जाते॥
गो की सेवा से दनुज देव बन जाते।
गो की सेवा से धन-धान्य ढेर लग जाते॥5.॥
था समय मान पाती थी, गो भारत में।
घर-घर पूजी जाती थी, गो भारत में॥
गो सेवक थे सब, भारत के नर-नारी।
सुख-बादल बन बरसी थी, गो भारत में॥6.॥
गो-वध कारण गिर रहा, देश दिन-दिन है।
गो-वध कारण बढ रहा, क्लेश दिन-दिन है॥
हम दीन-हीन बल क्षीण हुए जाते है।
गो-वध कारण घट रहा, शेष दिन-दिन है॥7.॥
गो वधिक कुछ भी नहीं विचार करते है।
भारी पातक से तनिक नहीं डरते है॥
कितना जघन्य अपराध कि जिससे पलते है।
उसके गले पर ही, हाय छुरी धरते है॥8.॥
गो-सेवा का फिर भाव जगे जन मन में।
गो-प्रेम प्रगट हो फिर मानव जीवन में॥
गो-रक्षा हित तन-मन-धन भेंट चढाकर।
सब जुट जायें दृढता से गो-पालन में॥9.॥
फिर तनिक कष्ट का नाम न रहने पाये।
फिर नहीं किसी को भी दुःख-दैन्य सताये॥
सच कहता हूँ उपहास न इसे समझना।
यह पिछङा भारत फिर ऊँचा उठ जाये॥10.॥
🙏श्रीसुरभी मईयाँ की जय…………..🙏

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