मै आप से आपकी दौलत नहीं मांग रहा..हा…आपका कुछ कीमती समय जरुर चाहता हु….!

आज बहुत ही विचलित मन से लेख लिख रहा हु…!

आप
सभी से करबद्ध विनती है…ये लेख जरुर पढ़े..और अपने
परिवार, मित्रो को भी पढाये…

मै आप से
आपकी दौलत नहीं मांग रहा..हा…आपका कुछ
कीमती समय जरुर चाहता हु….!
मित्रो…कल मुझे एक फेसबुक मित्र ने एक
विडियो लिंक भेजा….मैंने देखा…एक जगह
थी जहा कई जानवर बंधे हुए थे.

…छोटे , बड़े,
बच्चे..वहा एक अजीब सा खौफनाक माहोल था…बड़े
जानवरों के चेहरे और उनके हावभाव से ही लग
रहा था की वे विचलित है..डरे हुए
है…उनका चारा पानी पास ही था पर कोई उसे
खा नहीं रहा था..चूँकि वे बंधे हुए थे इसलिए
अपनी रस्सी के दायरे तक आगे पीछे हो रहे थे…और रह
रह कर कभी अपने बच्चो को जो खुले हुए थे उन्हें देख रहे
थे या वहा एक बड़ा दरवाजा था उस तरफ तांक रहे
थे…!

बच्चे अपनी मस्ती में खेल रहे थे कूद रहे थे, कभी एक दुसरे
पर कभी पानी में..फिर दौड़ कर ख़ुशी से अपनी माँ के
पास भाग जाते..उनके इस खेल से
लगता था मानो सारी दुनिया उन्हें मिल गई
हो ना डर ना कोई खौफ..बस माँ और खेल के बिच
ही उनकी दुनिया थी….मरे जहन में एक प्रश्न
था..की..क्या फर्क है ?

..इंसानी बच्चो मे और इन
बेजुबानो के बच्चो में…वही मासूमियत, वही शरारत,
वही उचलकुद सभी कुछ वही तो था जो हमने अपने
बच्चो में देखा था….बच्चे खेलते खेलते अपनी माँ के
पास भाग आते….और माँ तो जाने बस वो ही पल
का इन्तजार कर रही थी की कब वो अपने कलेजे के
टुकड़े को अपनी ममता की आगोश में ले…उसे दुलारे…!
पर ये एहसास करने के लिए माँ का दिल
होना जरुरी है….!

वो बच्चे को चाटने
लगी…मानो की कह रही हो……मेरे बच्चे मुझसे दूर मत
जाओ…मेरे पास ही रहो…पर वो कहा मानने
वाला था फिर फुदकता, कूदता अपनी माँ से दूर
हो गया…ये सीलसीला कुछ आधे घंटे तक
चलता रहा….माँ के पास आना और फिर भाग
जाना..क्रमश: ये सबकुछ वहा मौजूद
सभी बच्चो का सिलसिला था…पर…ये
बच्चा जिसका में जिक्र कर रहा हु कुछ विशेष है…!

तभी…वहा मौजूद सभी पशु अचानक जोर जोर से
चिल्लाने लगे..लगे चीत्कार मारने लगे…उन्हें शायद
वहा घटने वाली घटना का अनुमान
होगा….तभी वो इस तरह का बर्ताव कर रहे थे….!
वहा दो आदमियों ने प्रवेश किया शक्ल से ही डरावने
और बदसूरत…

ईश्वर ने भी उन्हें शायद कर्म के अनुरूप
ही रूप दिया था…उन्हें देख कर पशु-
पक्षी ही क्या शैतान भी घबरा जाए……दोनों के
हाथो में रस्सी और डंडा था….वो दोनों जैसे जैसे आगे
बढ़ रहे थे…बड़े पशुओ में हलचल भी बढ़ रही थी और
बैचेनी भी…हा…इन सब से उन बच्चो के खेल पर कोई
फर्क नहीं पड़ रहा था….

वो तो मस्त-मलंग हो कर
अपना खेल खेल रहे थे…वो दोनों आदमी में से एक बड़े
पशुओ के पास खड़ा हो गया और डंडे से उन्हें अन्दर
धकेलने लगा…दूसरा उन बच्चो के नजदीक गया और
खड़ा हो कर कुछ देर सोचने लगा….उधर उन माओ
का कलेजा बाहर आ रहा था….

तभी दूसरा आदमी उस
बच्चे की और बढ़ा जिसका मैंने जिक्र
किया था….और उसको पकड़ने दौड़ा…बच्चा भी उसे
अपने खेल का हिस्सा समझ कर कूद कूद कर आगे दौड़ने
लगा…माँ जोर जोर से अपने बच्चे को पुकार
रही थी…रो रही थी क्योकि उसे पता था की ये
खेल नहीं था..!

आखिर उस आदमी ने उस बच्चे की और
जोर से डंडा फैका जो उसके पिछले पांव में लगा और
बच्चा गिर गया…आदमी उसकी तरफ तुरंत भागा और
उसे अजगर की तरह दबोच लिया…उसके गले में
रस्सी का फंदा डाल दिया…

अब बच्चा भी समझ
गया था की वो खेल नहीं था…..बच्चा जोर जोर से
चिल्लाने लगा अपनी माँ की तरफ देख कर उसे
मासूमियत से पुकारने लगा…माँ अपने बच्चे के साथ
हो रहे कर्म को हताश हो कर देख
रही थी….वो अपनी बंधी हुई रस्सी से छुटने का भरसक
और नामुमकिन कौशिश कर रही थी…..! बाकि के
बच्चे ये द्रश्य देख कर मारे डर के अपनी माओ के पास
भाग गए….पर उस वक्त उनकी माओ की नजर अपने
बच्चो पर नहीं उस बच्चे पर थी जो उस राक्षस के चंगुल
में था….!

बच्चा उस हैवान के हाथो से छुटने की नाकाम हिम्मत
दिखा रहा था…वो जितना छुटने की कौशिश
करता वो हैवान उसे उतना ही मार मारता…बच्चे
की माँ ये सब अपनी आँखों के सामने देख रही थी…पर
वो बेचारी क्या कर सकती थी सिवा देखने के….!

बच्चा धीरे धीरे अपनी माँ से दूर
हो रहा था…वो शख्स उसे जमीन पर घसीटता हुआ ले
जा रहा था…बच्चा अपनी माँ को पुकार
रहा था मदद के लिए
बुला रहा था…माँ को भी कहा चैन मिलने
वाला था..अपने दिल के टुकड़े को दूर जाते देखकर
वो भी उसे पुकार रही थी..उस पुकार का मतलब
शायद ये कहना था…की मेरे बच्चे मुझे माफ़ करना में
तेरी मदद नहीं कर सकी….! कुछ देर में
बच्चा अपनी माँ से दूर हो गया…हा…उसकी रुदन जरुर
उसकी माँ के कान तक पहुच रही थी……!

कुछ ही देर में एक जोर से कुछ आवाज आई….पर…उस
आवाज के साथ बच्चे की आवाज बंद
हो गई…थोड़ी देर बाद पहला आदमी एक बर्तन
जो बड़ा था और खून से सना था लेकर
आता दिखा…

उसने उस बर्तन को पास ही पड़े कचरे में
खाली कर दिया…जैसे ही बर्तन
खाली किया…वहा खड़े सभी पशु और उनके बच्चे बहुत
ही गहरी निगाह से देखने लगे…उनमे से उस बच्चे
की माँ भी शामिल थी…

साथियों…में
उसकी माँ की आँखे तलाश रहा था…जैसे
ही उसकी माँ ने कचरे में झाँका वो करुना से भर
गई..उसकी आँखों में आंसू में साफ़ साफ देख
रहा था….वो खामोश थी…कचरे में उसकी आँखों के
तारे का कटा हुआ सर पडा था…! ये मंजर देख शायद
भगवान् भी रो पडा होगा…!

माँ शांत खड़ी कभी अपने बच्चे के को देखती कभी उस
तरफ जहा उसने अपने बच्चे को बिलखते हुए अंतिम बार
देखा था…वो अभी भी यकीन नहीं कर
रही थी की ये उसके लाल का सर है जो कुछ देर पहले
ख़ुशी से शरारत कर रहा था खेल रहा था…

वो तो उधर
देख रही थी की उसका लाल फिर वही से
खेलता कूदता वापस आएगा और अपनी माँ की आगोश
में समां जाएगा…..पर ये मुमकिन
नहीं था…उसका लाल इंसानी हैवानो के पेट की आग
बुझाने के लिए कट चुका था…मर चूका था…!
मरा वो नहीं था…मरी थी एक
माँ की ममता..मरी थी तथाकथित
मानवो की मानवता…और मरी थी उस इश्वर
की ईश्वरीय शक्ति…!

ये कहानी उस एक माँ की नहीं उन
हजारो लाखो माओ की है जो हर दिन इंसान नाम के
जानवर की उदर पूर्ति के लिए बेरहमी से काट दिए
जाते है….कभी सोचिये…आप अपने बच्चो का दर्द एक
पल के लिए नहीं सह सकते उसकी तकलीफ पर आप रात
रात नहीं सो सकते…तो वो भी किसी के बच्चे
है..जिन्हें बिना कसूर काट दिया जाता है…मात्र
अपनी संतुष्टि के लिए….पर वो दर्द समझने के लिए
तो मानवता चाहिए…जो मानव भूल चूका है….!
अरे…हमसे तो ये जानवर अच्छे जो हमे बिना मतलब के
कोई नुकसान नहीं पहुचाते…! में इस लेख के माध्यम से
उन नर पिशाचो तक एक बात पहुचना चाहता हु…

उन
पेट के भूखो को ये कहना चाहता हु…की अगर
माँ का दूध पिया है तो किसी हिंसक जानवर
को खुला मार के दिखाओ और अपनी तृस्ना मिटा के
दिखाओ तो में मान लूँगा की मै गलत
हु….वर्ना हैवानियत छोड़ कर मानवता की और आ
जाओ…वर्ना उस महाकाल पशुपति नाथ
का तीसरा नेत्र खुल गया तो अपने और अपने
सपोलो को बचा नहीं पाओगे…भागने के लिए
धरती कम पड जाएगी…!
मित्रो….यकीं करे ये लेख लिखते हुए..मेरी आँखे नम
है….में अपने आप को रोक नहीं पा रहा….!

मुझे इस लेख
को लिखने का कोई मूल्य नहीं मिला..ना कोई
आशा रखता हु..मेरी आत्मा ने कहा लिख दिया…बस
आप से एक आशा है ज्यादा से ज्यादा लोगो तक उस
माँ की करुण विनती समझ कर इस लेख को शेयर
करे…..शायद हमारी आप की पहल इस पुण्य
भूमि माँ भारती का श्वेत आँचल निरीह पशुओ के रक्त
से लाल होने से बच जाए….लेख को पढने के लिए आप
का आभारी हु…………!

बुलंदी का नशा सिम्तो के जादू तोड़ देती है,
हवा उड़ते पंछियों के बाजू तोड़ देती है,
थोड़ी गैरत जरुरी है इंसानी भेडियो,
किसी मौके पर तवायफ तक अपने घुंघरू तोड़ देती है..!
राज…!
(नोट: ये लेख किसी की भावनाओ को आहात करने
हेतु नहीं अपितु जन जागरण के लिए लिखा गया है….!

जिस किसी भी मलेछ व्यक्ति को इस लेख से
आपत्ति हो..वो व्यक्तिगत रूप से मुझ से मिलकर
अपनी दुर्भावनाओ का निराकरण कर
सकता है……..!!)

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