प्रधान मंत्री महोदय एक नजर इस ओर भी !

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प्रधान मंत्री महोदय एक नजर इस ओर भी ! 
किस तरह ये मांसाहारी, ये मौत के सौदागर, ये माँ के अंस को ही खा जाने वाले दैत्य, ये माँ को मारकर धन के लिए बन चुके नर पिचास हमारी भारत की संस्कृति को तार -तार करने वाले , हमारे प्राकृतिक संसाधन का दोनों हाथो से दोहन करने वाले , हमारे जल श्रोत को बर्बाद करने वाले , हमारे कृषि योग्य भूमि भूख को मिटाने वाली माँ को बंजर कर देने वाले, हमारे नवजवानों और बच्चो के रोजगार के दुशमन और फिर जिस थाली में खाते है उसी में छेद करदेने वाले आतंक बाद के जड़ किस तरह किस तरह गौहत्या के नाशुर से हमें बर्बाद कर रहे है एक गहरी नजर जरूर डालिये हम असहनीय पीड़ा से पीड़ित है इन आकड़ों से आप भी आखों में आशु उतारिये I I 
श्रीमान जी गोहत्या का प्रश्न केवल हमारी धार्मिक आस्थाओं से ही नहीं जुड़ा है, बल्कि देश के अर्थतंत्र, पर्यावरण व जलसंकट जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दे इससे सीधे प्रभावित होते हैं। आज बड़ी गंभीरता से यह बात कही जाती है कि अगला विश्व युद्ध पानी के लिए होगा, इस दृष्टि से यदि कत्लखानों का विचार करें तो जलसंकट को बढ़ाने में इनकी भूमिका की अनदेखी नहीं की जा सकती। एक कत्लखाने में प्रति पशु पांच सौ लीटर पानी लगता है। 
हिन्दुस्तान टाइम्स के 09 – 04 – 1994 के अंक में प्रकाशित एक रपट के अनुसार कोलकाता के मोरी गांव कत्लखाने में 17 लाख 50 हजार लीटर पानी प्रतिदिन लगता है। इसके विपरीत एक व्यक्ति को प्रतिदिन औसतन 25 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। 
इसका अर्थ यह हुआ कि कोलकाता के इस कत्लखाने में करीब 70 हजार लोगों के उपयोग का पानी नष्ट कर दिया जाता है। मुम्बई के पास देवनार कत्लखाने में 18 लाख 50 हजार लीटर पानी प्रतिदिन खर्च होता है। यहां लगभग 74 हजार लोगों के उपयोग का पानी नष्ट कर दिया जाता है। तिलंगाना के मेदक जिल्ले में स्थित कत्लखाने अल-कबीर एक्सपोर्ट लिमिटेड में 6 हजार 600 पशु प्रतिदिन काटे जाते हैं इनमें गौवंश की तादाद भी बड़ी संख्या में होती है । यहां 1 लाख 32 हजार लोगों के उपयोग का पानी प्रतिदिन नष्ट कर दिया जाता है। 
गाय का दूध 30 – 35 रु. प्रति लीटर की दर से मिलता है, जबकि देश में 18 – 20 रु. लीटर पानी बिक रहा है। जिस देश में गाय का दूध नहीं बेचा जाता था उस देश में पानी बेचा जा रहा है। ये कत्लखाने जितना पानी बर्बाद कर रहे हैं उससे पानी का संकट देश में कितना गंभीर होने वाला है यह समझा जा सकता है । इसलिए यह विचार करने की आवश्यकता है कि आज देश में पानी की ज्यादा आवश्यकता है या मांस की ?????? 
इतनी बड़ी संख्या में पशुओं की हत्या का असर बेरोजगारी बढ़ाने में भी हुआ है। 1981- 82 में देवनार मुम्बई में 26 लाख 41 हजार 917 पशुओं का क़त्ल किया गया। इसमें 1 लाख 20 हजार 656 बैल काटे गए। इस कत्लखाने में उस समय 1660 कर्मचारी कार्यरत थे। इसके विपरीत यदि यह पशु धन जीवित रहता तो पशुपालन से 96 हजार 927 लोगों को रोजगार मिलता। इसका अर्थ इस कत्लखाने में उस एक वर्ष की अवधि में ही हजारों लोगों का रोजगार छीन लिया गया। पशुओं से रोजगार का अनुपात है 5 गायों पर 1 व्यक्ति की दर से रोजगार मिलना। 
देश में कुल खेती का 28 प्रतिशत बड़ी जोत वाले किसान हैं जो ट्रेक्टरों से खेती करते हैं जबकि 5 एकड़ से नीचे वाले 72 प्रतिशत छोटे व मझोले किसान हैं। ट्रेक्टर, रासायनिक खाद, कीटनाशक और डीजल की महंगी कीमतों के कारण कृषि फसल का उत्पादन मूल्य बहुत ज्यादा बढ़ गया है। जबकि इसके अनुपात में अनाज की कीमत बाजार में कम होती है। छोटे किसान को यह सीधा घाटा होने के कारण उसको गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है। इसी कारण लाखों किसानों ने देश के विभिन्न क्षेत्रों में आत्महत्याएं कर लीं। 
खेती घाटे का सौदा हो जाने के कारण 72 प्रतिशत जो छोटा किसान गांव में रहता था वह शहरों की ओर पलायन कर रहा है। वह शहरों में मजदूरी करके झुग्गी-झोपड़ियों में अभावग्रस्त जीवन जी रहा है। इसके मूल में गौ-धन एवं अन्य पशु- धन का खत्म होते जाना और इसके कारण गांवों का उजड़ना है। रासायनिक खादों के उपयोग से विश्व भर में 6 प्रतिशत नाइट्रो आक्साइड की मात्रा बढ़ गई है। इससे भूमि का तापमान बढ़ा है, जिसे ग्लोबल वार्मिंग कहा जा रहा है और जिसके कारण मौसम चक्र तेजी से बदल रहा है। किसान आन्दोलन में जेल गए सरदार पटेल से जेल में मिलने आया एक अंग्रेज पत्रकार ने पूछने पर कि आपकी “कल्चर” क्या है, सरदार पटेल ने जवाब दिया “माई कल्चर इज एग्रीकल्चर” —पर वे भी गौहत्या बन्द नहीं करा पाये ! 
निवेदक आपका प्यारा मित्र 
गोवत्स राधेश्याम रावोरिया 
WWW.GOKRNATI.COM 

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