१९४७ से जो भी लोग सत्ता में आते हैं गाय के प्रति उनके ध्वनि बदल जाती हैं। हम भारत के लोग आशा रखते थे कि माननीय नरेन्द्र मोदी के प्रधान मंत्री बनते ही कम से कम गाय के अस्तित्व का मामला सुलझ जाएगा। लेकिन जो चीजें सामने घट रही है और घट चुकी है उससे नाकारा भी नहीं जा सकता है। भाजपा की सरकार गाय के प्रति चाहे जो कहे लेकिन आंकड़े कुछ और बोलते हैं।
पिछले साल भर में भारत से गोमांस का निर्यात पंद्रह प्रतिशत बढ़ा है। राजग सरकार की मंत्री मनेका गांधी के अनुसार अकेले बंगला देश को सोलह हजार टन गोमांस बेचा जा चुका है। विश्व हिंदू परिषद के प्रवीण तोगड़िया के अनुसार देश में सर्वाधिक गोमांस उत्पादन गुजरात में हुआ है। इस अवधि में नरेंद्र मोदी की सरकार रही है। वे बारह वर्ष गुजरात के मुख्यमंत्री रहे। तब गोचर भूमि उद्योगपतियों को कुड़े के भाव में देने का आरोप भी उनपर लगा था। भारत में गुलाबी (दुग्ध) क्रांति का नारा बुलंद करने वाले नरेन्द्र मोदी ने जन्माष्टमी (१ अक्तूबर, २०१२) पर अपने ब्लॉग में आरोप लगाया था कि यूपीए सरकार गोमांस निर्यात द्वारा आय बढ़ा रही है। अब क्या उत्तर देंगे प्रधानमंत्री मोदी ? सत्ता में आते ही गोमांस निर्यात पर १२ वर्ष पूर्व बने कानून को कड़ाई के साथ लागू करने में इतनी देरी क्यों हो रही है। एक ओर सरकार कह रही है कि गोमांस निर्यात नहीं हो रहा है तो दूसरी ओर जो देश गोमांस खरीद रहे हैं वे कह रहे हैं कि उनके देश में गोमांस की आपूर्ति भारत कर रहा है। फिर इतना बड़ा झूठ क्यों बोला जा रहा है ?
इस संदर्भ में वर्ष १९४७ के बाद की स्थिति का विश्लेषण करें तो पता चलता है कि गाय की रक्षा के प्रति अभी तक की कोई भी सरकार ईमानदार नहीं रही है। मनमोहन सिंह सरकार के योजना आयोग ने बारहवीं पंचवर्षीय योजना में बूचड़खानों की संख्या में अत्यधिक वृद्धि का लक्ष्य तय किया गया था। मोंटेक सिंह अहलूवालिया पशु कत्लगाहों के आधुनिकीकरण के लिए अरबों रुपए की राशि आबंटित कर चुके थे। लाइसेंस में भी बढ़ोतरी का आदेश दिया था। इस सत्य को कौन नाकार सकता है ?
आज जो भाजपा है कल भारतीय जनसंघ था। जनसंघ की शुरुआत ही गाय की रक्षा से हुई है। जब नए – नए अटल बिहारी वाजपेयी राजनीति में आए थे तब वे भी गाय की रक्षा के नारे लगाते थे और गाय के रक्षार्थ जेल भी गए। उन्होंने नारा भी लगाया था ‘कटती गौवें करें पुकार, बंद करो यह अत्याचार।’ लेकिन जब उन्हें सत्ता मिली तो वे भी नारा भूल गए। ‘गाय हत्या रोकने का कानून राज्यों का है और राज्य ही इसे अमल में ला सकते हैं’ की आड़ में रहकर अपना दोष राज्यों के ऊपर मढ़ दिया। प्रश्न उठता है कि राज्य देश से परे हैं क्या ? भारत के राज्य क्या भारत के संसद के निर्णय से मुकर सकते हैं ? उन दिनों केन्द्रीय कृषिमंत्री पंजाब में मुख्यमंत्री रह चुके स्व.सुरजीत सिंह बरनाला थे। वाजपेयी जी ने इन्हें राज्यों को मनाने का कार्यभार सौंपा था। लेकिन पी ए संगमा, ममता बनर्जी और चन्द्रबाबू नायडु को वे मना नहीं पाए। पी ए संगमा ने कहा – गौमांस का भक्षण तो हम बचपन से करते आ रहे हैं, यह वैâसे बंद किया जा सकता है ? ममता बनर्जी ने कहा – गौमांस खाना तो हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है। चन्द्रबाबू नायडु ने कहा हमारे प्रदेश में मुस्लिम जनसंख्या अधिक है इस कारण गौहत्या बंदी नहीं हो सकता। मामला अटक गया। संसद भी चुप हो गई। संसद ने इसे गंभीरता के साथ नहीं लिया। अटलजी छह वर्षों तक राज किये, गोवध नहीं रोका? एक बहाना मिल गया था। पशुधन पर कानून केवल राज्य बना सकते हैं। संविधान में यह विषय केवल राज्य – सूची में है। प्रश्न उठता है कि फिर क्यों नहीं बदलते ऐसे कबाड़ी संविधान को ?
भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ६ अप्रैल, १९३८ को एक पार्टी अधिवेशन में घोषणा किये थे कि आजादी मिलने पर कांग्रेस कभी भी गोवध पर पाबंदी नहीं लगाएगी। बाद में गाय के प्रति भारतवासियों की भावना को ताड़कर बयान बदला और १९४५ आते – आते कहने लगे आजादी मिलने के बाद पहला कानून गौहत्या बंदी का बनेगा। प्रधानमंत्री बनने के बाद गोहत्या बंदी से मुकर गए और आचार्य विनोबा भावे की भावनाओं का भी कद्र नहीं किया। यहां तक कि संसद में बोला कि किसी भी किसी भी कीमत पर गौहत्या बंदी नहीं हो सकता। और कह डाला कि यदि मजबूर किया गया तो वे त्यागपत्र दे देंगे। क्योंकि वे जानते थे कि उनके चमचे जो उन दिनों संसद में थे वे ऐसा कभी नहीं होने देंगे। इस प्रकार नेहरु ने गाय के प्रति धोखा भी दिया और और बात भी बदली।
गांधीजी ने कहा था कि ‘जो गाय बचाने के लिए तैयार नहीं है, उसके लिए अपने प्राणों की आहुति नहीं दे सकता, वह हिंदू नहीं है।’ उधर मुसलिम लीग नेता मोहम्मद अली जिन््नाा से पूछा गया कि वे पाकिस्तान क्यों चाहते हैं? उनका उत्तर था, ‘ये हिंदू लोग हमसे हाथ मिला कर अपना हाथ साबुन से धोते हैं और हमें गोमांस नहीं खाने देते। मगर पाकिस्तान में ऐसा नहीं होगा।’
गाय के संबंध में अब कुछ बातें जो राजनीति से हट कर है। पैगंबरे-इस्लाम की राय जग-जाहिर है कि ‘गाय का आदर करो, क्योंकि वह चौपाए की सरदार है।’ भारत के इस्लामिक केन्द्र के वरिष्ठ सदस्य मौलाना मुश्ताक ने लखनऊ प्रेसक्लब में (१४ फरवरी, २०१२) कहा था कि ‘नबी ने गोमूत्र पीने की सलाह दी थी। इससे बीमार ठीक हो गया था।’ वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआइआर) ने अपनी सहयोगी संस्थाओं के साथ मिल कर गोमूत्र के पेटेंट के लिए आवेदन पर कार्य किया है। लोकसभा में एक प्रश्न के जवाब में तत्कालीन स्वास्थ्यमंत्री गुलाम नबी आजाद ने बताया था कि शोध में पाया गया है कि पंचगव्य घृत पूरी तरह सुरक्षित और कई घातक बिमारियों की चिकित्सा में बहुत प्रभावकारी है।
पश्चिमी वैज्ञानिकों ने सिद्ध कर दिया है कि गौमूत्र में कार्बोलिक एसिड होने के कारण कीटनाशक होता है। अमेरिकी वैज्ञानिक मैकफर्सत ने २००२ में गोमूत्र का पेटेंट औषधि के वर्ग में करा लिया था। चर्म रोग के उपचार में यह लाभप्रद पाया गया है। गाय को चलता फिरता अस्पताल कहा। मेलबर्न विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक मैरिट क्राम्स्की द्वारा हुए शोध से निष्कर्ष निकला कि गाय के दूध को मिलाकर बने क्रीम से एचआइवी से बचाव होता है। पंचगव्य पदार्थों के गुण सर्वविदित हैं। मसलन, गोबर से लीपी गई जमीन मच्छर – मक्खी से मुक्त रहती है। महान नृशास्त्री वैरियर एल्विन ने निजी प्रयोग द्वारा कहा था कि दही से बेहतर पेट – दर्द शांत करने का उपचार नहीं है। नाइजीरिया ने भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति स्व. एपीजे अब्दुल कलाम की सरकारी यात्रा पर अनुरोध किया था कि पूर्वी उत्तर प्रदेश की तीन हजार गंगातीरी गायें उनके देश की जरुरत है, भेजने की व्यवस्था की जाए। उस गाय का दूध, दही और मक्खन स्वास्थ्यवर्धक होता है। अंगरेजों ने गंगातीरी गाय के दूध के सेवन के लिए वारानसी में एक गौशाला बनवाई थी जो आज भी चल रही है। लेकिन दुखद तथ्य है कि प्रतिवर्ष सरकारें गायों को कसाईयों के हाथ निलाम करती है।
आल इंडिया मुसलिम मजलिस के उत्तर प्रदेश सचिव मौलाना बद्र काजमी ने आरोप लगाया था कि जिला पुलिस और मांस व्यापारियों की मिलीभगत से सहारनपुर जिले में बड़े पैमाने पर गोवंश की कटान हो रही है। लखनऊ के धर्मगुरुमौलाना इरफान फिरंगी महली ने २९ अगस्त, २०१२ को गोहत्या बंदी की मांग की थी। कुरान के जानकार इबेंसनी और हाकिम अबू नईम खुद पैगंबर की उक्ति की चर्चा करते हैं कि ‘लाजिम कर लो कि गाय का दूध पीना है, क्योंकि वह दवा है। गाय का घी शिफा है और बचो गाय के गोश्त से चूंकि वह बीमारी पैदा करता है।’ हजरत इमाम आजम अबु अनीफा ने लिखा है कि ‘तुम गाय का दूध पीने के पाबंद हो जाओ। चूंकि गाय अपने दूध के अंदर सभी तरह के पौधों के सत्त्व को रखती है।’ अपनी शोधपूर्ण पुस्तक ‘मुसलिम राज में गोसंवर्धन’ में डॉ सैयद मसूद ने लिखा भी है कि अकबर के समय में गोवध प्रतिबंधित था। फारसी में लिखी अपनी वसीयत में बाबर ने १५२६ में गोकशी पर पाबंदी लगाई थी, जिसका उनके बेटे हुमायूं ने पूरी तरह पालन किया था। आज विश्व के सबसे बड़े मुसलिम राष्ट्र इंडोनेशिया के बाली द्वीप में लंबू नामक सफेद गाय (स्थानीय भाषा में तरो) की पूजा-अर्चना की जाती है। उसका दाह-संस्कार भी किया जाता है।
इन तथ्यों से प्रमाणित होता है कि गाय कोई सांप्रदायिक जीव नहीं है। इसकी रक्षा तत्काल होनी चाहिए नहीं तो संपूर्ण सृष्टि काल-कलवित हो जाएगी।.

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