११ – पञ्चगव्य चिकित्सा 
१ – अर्कमूल की छाल १० ग्राम ,त्रिफला चूर्ण १० ग्राम ,एक साथ आधा किलो जल में अष्टमांस क्वाथ सिद्ध कर प्रतिदिन प्रात: उसमें १ ग्राम मधु और तीन ग्राम मिश्री मिलाकर सेवन कराये,और साथ ही अर्कमूल को गाय के दूध से बनी छाछ में पीसकर श्लीपद पर गाढ़ा लेंप करे ,४० दिन में पूर्ण लाभ आयेगा । 


२ – आक के १०-२० फलो को बिना अग्नि मे तपाये हुये मिट्टी के बर्तन में भरकर ,मुँह बन्द कर गाय के गोबर से बने उपलो की आग में फूँककर ठन्डा होने दें ,और फिर भस्म को निकालकर सरसों के तेल में मिलाकर लगाये ।यह गलित कुष्ठ की प्रथम अवस्था में उपयोगी है । 


३ – पेट में जहाँ तीव्र वेदना हो ,उस स्थान पर आक के २-३ पत्तों पर पुराना घी चुपड़कर गरम करेऔर दर्द के स्थान पर रख दें ,तथा थोड़ी देर के लिए वस्त्र बाँध दें । 


४ – आक का दूध ४ बूँद कच्चे पपीते का रस १० बूँद और चिरायते का रस १५ बूँद मिश्रण को दिन में तीन बार गोमूत्र से सेवन करने पर ३ दिन में ही बिगड़ा हुआ मलेरिया ठीक हो जाता है । 


५ – प्लीहा आदि यकृत रोगों मे – आक का पत्ता एक इंच चकौर महीन क़तर कर ५० ग्राम पानी में पकावें । जब आधा जलशेष रह जाये तब उसमें सेंधानमक १२५मि० ग्राम मिला ,तीनवर्ष तक के बालक को ७ दिन तक पिलावे और खाने में मूँग की दाल की खिचड़ी व गाय के दूध से बनी छाछ ही देने से ठीक होगा । 


६ – तैतया के काटने पर – आक के पत्रों के पीछे जो खार की तरह सफ़ेदी ज़मी होती है ,उसपर मैदा या आटे की लोई घुमाकर सफ़ेदी उतार लें। तथा लोई की कालीमिर्च जैसी गोलियाँ बना लें। प्रात: – सायं १-१ गोली निकलवा कर निहारमुख १५ दिन तक गाय का घी शक्कर में डालकर खिलाये । 


७ – दर्पनाशक- आक या आक के दूध के दुष्प्रभाव से बचाने केलिए रोगी को गाय का दूध तथा गाय का घी का उपयोग लाभकारी होता है । 


८ – यकृत – जिगर की कमज़ोरी मे ( जब पतले दस्त आते हो भूख न लगती हो ) ६ ग्राम आम के छाया में सुखायें हुये पत्तों को २५० ग्राम पानी में पकाये ,१२५ ग्राम जल रह जाने पर छानकर थोड़ा गाय का दूध मिलाकर प्रात: पीने से लाभ होता है । 


९ – आम की ताज़ी छाल को गाय के दूध से बनी दही के पानी के साथ पीसकर पेट के आसपास लेप करने से लाभ होता है । 


१० – रक्तातिसार – आम्रपत्र स्वरस २५ मि० ग्रा० ,शहद और गाय का दूध १२ -१२ ग्राम तथा गाय का घी ६ ग्राम मिलाकर पिलाने से रक्तातिसार में विशेष लाभ होता है । 

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