गौ – महिमा (गोबर,गोमय/cow dung)

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१. अग्रंमग्रं चरंतीना, औषधिना रसवने । 
तासां ऋषभपत्नीना, पवित्रकायशोधनम् ।। 
यन्मे रोगांश्चशोकांश्च , पांप में हर गोमय । 


अर्थात- वन में अनेक औषधि के रस का भक्षण करने वाली गाय ,उसका पवित्र और शरीर शोधन करने वाला गोबर ।तुम मेरे रोग औरमानसिक शोक और ताप का नाश करो । 


२. गोमय वसते लक्ष्मी – वेदों में कहा गया है कि गाय के गोबर लक्ष्मी का वास होता है ।गोमय गाय के गोबर रस को कहते है ।यह कसैला एंव कड़वा होता है तथा कफजन्य रोगों में प्रभावशाली है ।गोबर को अन्य नाम भी है गोविन्द,गोशकृत,गोपुरीषम्,गोविष्ठा,गोमल आदि। 


३. गोबर गणेश की प्रथम पुजा होती है और वह शुभ होता है ।मांगलिक अवसरों पर गाय के गोबर का प्रयोग सर्वविदित है ।जलावन एंव जैविक खाद आदि के रूप में गाय के गोबर की श्रेष्ठता जगत प्रसिद्ध है । 


४. गाय का गोबर दुर्गन्धनाशक,शोधक,क्षारक,वीर्यवर्धक ,पोषक,रसयुक्त ,कान्तिप्रद और लेपन के लिए स्िनग्ध तथा मल आदि को दूर करने वाला होता है । 


५. गोबर मे नाईट्रोजन ,फास्फोरस ,पोटेशियम ,आयरन ,जिंक,मैग्निज ,ताम्बा ,बोरोन,मोलीब्डनम्,बोरेक्स,कोबाल्ट-सलफेट,चूना ,गंधक,सोडियम आदि मिलते है । 


६. गाय के गोबर में एेन्टिसेप्टिक,एन्टिडियोएक्टिव एंव एन्टिथर्मल गुण होता है गाय के गोबर में लगभग १६ प्रकार के उपयोगी खनिज तत्व पाये जाते है । 


७. मैकफर्सन के अनुसार गोबर के समान सुलभ कीटनाशक द्रव्य दूसरा नहीं है रूसी वैज्ञानिक के अनुसार आण्विक विकिरण का प्रतिकार करने में गोबर से पुती दीवारें पूर्ण सक्षम है ।भोजन का आवश्यक तत्व विटामिन बी-१२ शाकाहारी भोजन में नहीं के बराबर होता है । 


८. गाय की बड़ी आँतो में विटामिन बी-१२ की उत्पत्ति प्रचूर मात्रा में होती है पर वहाँ इसका आवशोषण नहीं हो पाता अत: यह विटामिन गोबर के साथ बहार निकल आता है प्राचीनकाल में ऋषि-मूनि गोबर के सेवन से पर्याप्त विटामिन बी -१२ प्राप्त कर स्वास्थ्य लाभ लेते थे ।गोबर के सेवन तथा लेपन से अनेक व्याधियाँ समाप्त होती है । 


९. प्रो.जी. ई. बीगेंड,- इटली के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक ने गोबर पर सतत प्रयोग से सिद्ध किया कि गोबर में मलेरिया एंव क्षयरोग के जीवाणुओ को तुरन्त नष्ट करने की क्षमता होती है । 


१०- गाय का गोबर मल नहीं है यह मलशोधक है ,दुर्गन्धनाशक है एंव उत्तम वृद्धिकारक तथा मृदा उर्वरता पोषक है ।यह त्वचा रोग खाज,खुजली,श्वासरोग,जोड़ो के दर्द सायटिका आदि में लाभदायक है ।गोबर में बारीक सुती कपड़े को गोबर को दबाकर छोड दे थोड़ी देर बाद इस कपड़े को निचोड़कर गोमय प्राप्त कर सकते है ।इससे अनेक त्वचा रोगों में स्नान करते है ,मुहासे दूर करके चेहरे की कान्ति बनाये रखता है ,गोमय के साथ गेरू तथा मूलतानी मिट्टी व नीम के पत्तों को मिलाकर नहाने का साबुन बनाया जाते है यह चेहरे की झुरियाँ दूर करता है । 

१. लक्ष्मीश्च गोमय नित्यं पवित्रा सर्वमड्गंला । 
गोमयालेपनं तस्मात् कर्तव्यं पाण्डुनन्दन ।। 


अर्थात- गाय के गोबर में परम पवित्र सर्वमंगलमयी श्री लक्ष्मी जी नित्यनिवास करती है ,इसिलिए गोबर से लेपन करना चाहिए । 


२. सामान्यता गोमय कटु,उष्ण ,वीर्यवर्धक ,त्रिदोषशामक तथा कुष्ठघ््न ,छर्दिनिग्रहण,रक्तशोधक,श्वासघ््न और विष्घ््न है ।यह विष नाशक है विषों में गोमय-स्वरस का लेप एंव अंजन उपयोगी साबित हुए है ।गाय का गोबर तिमिर रोग में ,नस्य रूप में प्रयुक्त होता है ।बिजौरा नींबू की जड़,गौघृत,मन:शिला को गोमय में पीसकर लेप करने से मुख की कान्ति बढ़ती है । 
३. आग से जल जाने पर गोबर का लेपन रामबाण औषधि है ।ताज़ा गोबर का बार-बार लेप करते हुए उसे ठंडे पानी से धोते रहना चाहिए यह व्रणरोपण एंव कीटाणु नाशक है । 


४. सर्पदंश ,विषधर साँप ,बिच्छु या अन्य जीव के काटने पर रोगी को गोबर पिलाने तथा शरीर पर गोबर का लेप करने से विष नष्ट होता है अति विषाक्त्ता की अवस्था में मस्तिष्क तथा हृदय को सुरक्षित रखता है ।बिच्छु के काटने पर उस स्थान पर गोबर लगाने से भी उसका जहर उतर जाता है । 


५. पञ्चगव्य घृत के सेवन से उन्माद ,अपस्मार शोथ ,उदररोग,बवासीर ,भगंदर ,कामला,विषमज्वर तथा गुल्म का निवारण होता है ।मनोविकारों को दूर कर पञ्चगव्य घृतस्ननायुतंत्र को परिपुष्ट करता है । 


६. चेन्नई के डा. किंग के अनुसार गाय के गोबर किटाणु मारने की क्षमता रहती है ,इसमें ऐसी बिमारी के समय दूषित पानी में गाय का गोबर पानी में मिलाकर पानी शुद्ध कर उपयोग से प्लेग नहीं होता है ।और जिस भाग में बिजली का करन्ट लगा हो उस भाग पर गाय का गोबर लगाने से बिजली के करन्ट के असर में कमी अाती है । 


७. गाय के गोबर से बनी राख का उपयोग किसान भाई अपनी फसल को किटाणुओ ,बिमारीयों व जीवजन्तुओ से बचाने के लिए आदिकाल से प्रयोग करते आ रहे है । 


८. वैज्ञानिकों के अनुसार सेन्द्रिय खाद से पैदा किया आनाज खाने से हार्टअटैक नहीं होता है ।क्योंकि देशी खाद से शरीर द्वारा चाही गयी ४००मिलीग्राम मैग्निशियम तत्व की मात्रा मिलती है ।जो रासायनिक खाद में नहीं मिलती है ।मेग्नेशियम तत्व शरीर में रक्तप्रवाह के लिए रहना आवश्यक है । 


९. अग्निहोत्र जो कि यज्ञ काआधार है पुरातन वैदिक विज्ञान की अनमोल देन है ।गोबर से बनी यज्ञ समिधा का गौघृत के साथ उपयोग आदि काल से करते आ रहे है ।अग्निहोत्र से कई क्षेत्रों में जैसे कृषि ,वातावरण,जैव प्रजन्न व मनचिकित्सा तथा प्रदुषण दूर करने में विस्मयकारी रूप से लाभ होता है । 


१०. गोबर के कंडों से किये गये अग्निहोत्र से सूक्ष्मऊर्जा,तरगें ,एंव पौष्टिक वायु वातावरण में नि:सृत होते है ।जिसमें वनस्पतियों को पोषण प्राप्त होकर फसल में वृद्धि होती है ।पशुधन के स्वास्थ्य में सुधार तथा दूग्ध की गुणवत्ता में और प्रमाण में वृद्धि होती है ।केचुएँ व मधुमक्खियों में भी वृद्धि पायी जाती है ।अग्निहोत्र का भस्म एक उत्तम खाद है एंव कीटनियंत्रक औषध बनाने में भी उपयोगी है ।अग्निहोत्र की भस्म से बीज प्रक्रिया एंव बीज संस्कार अंकुरण अत्यन्त प्रभावशाली ढंग से होता है ।

१. अपाने सर्वतीर्थानी गोमुत्रे जाहृनवी स्वंय । 
अष्टएैश्वर्यमयी लक्ष्मी गोमय वसते सदा ।। 


अथार्त – गाय के मुख से निकली श्वास सभी तीर्थों के समान पवित्र होती है ।तथा गौमूत्र में सदा गंगा जी का वास रहता है ।और आठ एैश्वर्यों से सम्पन्न लक्ष्मी गाय के गोबर में वास करती है । 


२. तृणं चरन्ती अमृतं क्षरन्ती :- गायमाता घास चरती है और अमृत की वर्षा करती है तथा गाय का गोबर देह पर लगाकर शरीर शुद्ध करते समय हमारे धर्म-कर्म में महत्व अधिक रहता है।इसलिए धर्मशास्त्र में गौ के गोबर को उच्च स्थान प्राप्त है ।गोबर को सारे शरीर पर मलकर धूप में बैठने से खाज ,खुजली आदि त्वचा रोग नष्ट हो जाते है । 


३. हमारे प्रायश्िचत विधान में पञ्चगव्य( गोबर,गोमूत्र ,दूग्ध ,दही,घी )सेवन का बड़ा मैहत्व बताया गया है । जैसे अग्नि में ईंधन जल जाता है ,से ही पञ्चगव्य प्राशन से पाप के दूषित संस्कार नष्ट हो जाते है ।गोबर रोगों के कीटाणु और गन्ध को दूर करने में अद्वितीय है । 


४. छोटे बच्चों को संस्पर्श के रोग से मुक्त करने के लिए गोबर का तिलक देने की प्रथा है ।भगवान की मूर्ति की प्रतिष्ठा में गोबर के भस्म से मूर्ति का मार्जन किया जाता है तथा उिच्छष्ठ स्थान को शुद्ध करने के लिए ,गोबर का चौका लगाया जाता है । 


५. मृतगर्भ ( पेट में मरा हूआ बच्चा ) बाहर निकालने के लिए गोमय (गोबर का रस) ७ तोला,गौदूग्ध में मिलाकर पिलाना चाहिए । बच्चा आराम से बाहर आ जायेगा ।और गोबर को उबालकर लेप करने से गठियारोग दूर होता है । 


६. पसीना बंद करने के लिए सुखाये हुए गोबर और नमक के पुराने मिट्टी के बर्तन इन दोनो के चूर्ण का शरीर पर लेप करना चाहिए ।और गुदाभ्रंश के लिए गोबर गर्म करके सेंक करना चाहिए ।और खुजली के लिए गोबर शरीर में लगाकर गरम पानी से स्नान करना चाहिए । 


७. शीतला माता के फूट निकले छालों पर गाय के गोबर को सुखाकर जलाकर राख को कपडें में छानकर उससे भर दें ।इसपर यही श्रेष्ठ उपाय है ।और साधारण व्रण (घाव) के ऊपर घी में राख मिलाकर लेप करना चाहिए ।गाय के ताजे गोबर की गन्ध से बूखार एंव मलेरिया रोगाणु का नाश होता है ( डा़़. बिग्रेड,इटली ) 


८. पेट में छोटे -छोटे कीडे हुए हो तो ,गोबर की सफेद राख २ तोला लेकर १० तोला पानी मिलाकर ,पानी कपडें में छान लें । तीन दिन तक सुबह – शाम यही पानी पीलायें ।और रतौंधी में ताजे गोमय को लेकर के आँख में आँजने से दस दिन में राेग से छुटकारा हो जायेगा । 


९. दाँत की दुर्गन्ध,जन्तु और मसूडें के दर्द पर गाय के गोबर को जलावें ,जब उसका धुआं निकल जायें तब उसे पानी में डालकर बुझा लें ,सुख जाने पर चूर्ण बनाकर कपडछान कर लें ,इस मंजन से प्रतिदिन दाँत साफ़ करने से दाँत के सब रोग नष्ट हो जाते है । 


१०. आयुर्वेदानुसार गाय के सूखे गोबर पावडर से धूम्रपान करने से दमे, श्वास के रोगी ठीक होते है ।और हैजा के कीटाणु से बचने के लिए शुद्ध पानी में गोबर घोल कर छानकर पीने से कीटाणुओं से बचाव होता है और हैजा से मुक्त रहते है ।(डा.किंग.मद्रास) । 

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