यह सर्व विदित है कि भारतीय गौ वंश की प्रजनन क्षमता न्यूनतम है निम्न प्रजनन क्षमता में वृद्धि के लिए राष्ट्रीय डेरी अनुसंधान संस्थान करनाल द्वारा ब्यंाने के दो माह बाद गर्भित करवाने हेतु जांची गयी नव विकसित तकनीक मदकाल समक्रमण विधि (ओवसिंच प्रोटोकाॅल) को कृषकों के द्वार तक पहंुचाने की आवश्यकता है। इस तकनीक के अन्तर्गत ब्यंाने के 55-60 दिन के दौरान प्रथम दिन जी.एन.आर.एच.-रिसेप्टाल 2.5 मिली.,8 वे दिन पी.जी.एफ.- ल्यूटेलाइज- 5.0 मिली. एवं 10 वे दिन वापिस जी.एन.आर.एच.-रिसेप्टाल 2.5 मिली.,इंजेक्शन लगाया जाता है। इसके बाद 12 एवं 24 घण्टे पश्चात् 2 बार प्राकृतिक या कृत्रिम गर्भाधान विधि से गर्भित कराया जाता है। इस तकनीक का किसी भी प्रकार का साइड़ इफेक्ट भी नहीं पाया गया है। स्वास्थ्य रक्षा के अन्तर्गत फरवरी, जून व अक्टूबर माह में पेट में कीड़े मारने की दवा दिया जाना, समय-समय पर रोग निरोधक टीके लगवाना आदि की व्यवस्था सुनिश्चित की जानी चाहिए।
गौ आधरित जैविक खेती के अन्तर्गत कम लागत की प्र्यावरण मित्र एवं स्वावलम्बी कृषि पद्धति को अपनाने की है। बिना गौ वंश के टिकाउ कृषि कल्पना ही सम्भव नहीं है। प्राचीन काल से ही यह कहा जाता रहा है कि ‘‘गौमये वसते लक्ष्मी पवित्रा सर्वमंगला‘‘ अर्थात् गोबर परम पवित्र सर्व मंगलमयी लक्ष्मी जी का निवास है। इसका अर्थ हमें यह समझना चाहिये कि जो कृषक, कृषि में गोबर/गोमूत्र का उपयोग करेगे उनके यहंा लक्ष्मी जी का वास रहेगा। यह बात सत्य भी साबित हो रही है। जब से हमारे कृषकों ने बोबर गोमूत्र का महत्व भूलकर रसायनिक कृषि को अपनानया है, तबसे हमारे कृषको के यहंा से लक्ष्मी जी रूठ गयरी है। टिकाउ कृषि यंत्र के विकास मकं गौवंश अत्यन्त महत्वपूर्ण घटक है।
जीवांश खाद भूमि की भौतिक रासायानिक एवं जैविक संरचना सुधारते हैं। भूमि जल धारण क्षमता एवं वायु संचार बढ़ाते हैं। गोबर गौ मूत्र के उपयोग से फसलों के वनस्पति अवशेष, चारा इत्यादि को जल्दी विघटित कर उच्च गुणवक्ता की कम्पोस्ट खाद बनायी जाती है। यही नहीं कृषक परिवार को धुआं रहित ईधन उपलब्ध करवाने हेतु घर-घर में गोबर गैस प्लंाट स्थापित करवाये जाने चाहिये।
पशुपालन व्यवसाय में 80 प्रतिशत योगदान पशु प्रबंधन का होता है। अतः पशु प्रबंधन की वैज्ञानिक तकनीकियों जैसेः
-ब्याने के दो माह पूर्व से ही अतिरिक्त दाना खिलाना
-ब्याने के दो माह बाद ग्याभिन करवाना
-स्ंातुलित पशु आहार एवं हरे चारे का उपयोग करना
-नमक एवं खनिज लवणों को नियमित रूप से खिलाना एवं
-पेट के कीड़े मारने की दवा नियमित अन्तराल पर देना आदि को अपनाकर दुधारू पशुओं का एक वर्ष में ही 30 से 50 प्रतिशत तक दूध उत्पादन बढ़ाया जा सकता है तथा दुधारू गौ वंश से उनकी उत्पादक क्षमता का पूरा दोहन किया जा सकता है। उपरोक्त सुविधाऐं कृषक के द्वार पर ही उपलब्ध करवाने की आवश्यकता है।
पशु प्रबंधन की समस्त तकनीकियों का व्यवहारिक प्रदर्शन करने एवं तकनीकी आदानों को कृषकों के द्वार तक पंहुचाने में कृषि विज्ञान केन्द्रों पर कार्यरत पशु प्रंबधन वैज्ञानिक कारगर कार्य कर रहे है। कोटा संम्भाग में उक्त तकनीकियों के प्रर्दशन एवं प्रसार हेतु कृषि विज्ञान केन्द्र कोटा पर व्यवहारिक प्रदर्शन की सुविधाऐं विकसित करने हेतु भारतीय नस्ल की गीर एवं साहीवाल नस्ल की गायों की डेरी इकाई, गोबर एवं गौ मूत्र से जैविक कीट नाशक उत्पादन ईकाइ गोबर गैस एवं मिनिरल मिक्चर आदि के उपत्पादन की इकाईयंा स्थापित करवाने की आवश्यकता है।
बढ़ती आय, शहरीकरण, खान-पान की बदलती आदतो, जनसंख्या मंे वृद्धि तथा निर्यात के अवसर जैसे विभिन्न कारणों से दूध की मांग बढ़ रही है। योजना आयोग के अनुमान और सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में लगातार उच्च विकास में सुधार के आधार पर मिले आंकडो से यह अनुमान है कि वर्ष 2016 -17 में दूध की मांग करीब 155 मिलियन टन होगी और 2021-22 तक 200 मिलियन टन से अधिक होगी। इस बढ़ती मांग को पूर्ण करने के लिये अगले 15 वर्षो में वार्षिक वृद्धि दर 4 प्रतिशत से अधिक बनाये रखने की आवश्यकता हैं, इसलिये यह जरूरी है कि वर्तमान देशी गायों की प्रजनन क्षमता एवं आहार प्रबंधन पर ध्यान केन्द्रित कर उत्पादकता बढ़ाने के लिये पशु प्रबंधन की वैज्ञानिक तकनीकियों को सभी पशुपालको तक पहुंचाने की आवश्यकता है।
पशु प्रबंधन की तकनीकियों एवं संसाधनों को कृषक के द्वार पर ही उपलब्ध करवाने हेतु राजस्थान में अलग से कोई पशुपालन प्रसार अधिकारी/कार्यकर्ता नहीं है। समाधान स्वरूप पशुपालन विभाग में कार्यरत पशु चित्किसा अधिकारियों को सप्ताह में दो बार दोपहर के बाद निकटतस्थ के दो अलग-अलग ग्रामों में पशुपालक क्लबों की मासिक बैठकों में भाग लेने हेतु निदेर्शित कर सदस्य पशु पालकों को पशु पोषण पशु प्रजनन, पशु आवास एवं स्वाथ्य रक्षा प्रबंधन की जानकारियां एवं सेवाऐं निःशुल्क उपलब्ध करवायी जा सकती है। इस प्रकार से एक पशु चित्किसा अधिकारी निकट के 8 गंावों में पशु पालन प्रसार अधिकारी के रूप में सेवाऐं देकर ग्रामीणों को लाभान्वित कर अल्प समय में ही दूध उत्पादन में वृद्धि करवा सकता हैं। राजस्थान में लगभग दो हजार पशु चित्किसा अधिकारी हैं जो प्रति वर्ष 16000 गांव के आठ लाख पशु पालकों का लाभ पंहुचा सकते हैं।
राज्य सरकार द्वारा प्शुओं के स्वास्थ्य रक्षार्थ सभी प्रकार की दवाऐं एवं दुधारू पशु की उत्पादकता बढ़ाने एंव प्रजनन क्षमता में सुधार लाने हेतु मिनिरल मिक्चर निःशुल्क उपलब्ध करवाया जा रहा हैं। मिनिरल मिक्चर के विषय में जन चर्चा रहती है कि सरकारी वस्तु कम गुणवक्ता की होती है। यहंा सुझाव देना चाहूगंा कि पशु चित्किसालयों द्वारा उपलब्ध करवाये जाने वाले मिनिरल मिक्चर की हर चार माह में प्रयोगशालाओं में जांच करवाये जाने की व्यवस्था विकसित करवायी जावे। सम्भव हो सके तो सरकारी स्तर पर ही सम्भाग वार मिनिरल मिक्चर तैयार करवाया जावे क्योंकि मिनिरल मिक्चर कम खर्च का बीमा है कृषि विज्ञान केन्द्र पर भी क्षेत्रीय आवश्यकतानुसार मिनिरल मिक्चर तैयार कराने की इकाईयां स्थापित करवायी जा सके।
पीक दूध उत्पादन का सम्बन्ध पूरे ब्यांत काल के उत्पादन से जुड़ा हुआ हैं इसलिए पीक दूध उत्पादन बढ़ाने हेतु ग्याभिन गायों को ब्यंाने के दो माह पूर्व से 2-4 किलो दाना/बाटा खिलाने से ब्यंाने के बाद गाय अपनी पूर्ण क्षमता अनुसार प्रथम माह में अधिकतम दूध उत्पादित कर 10 से 12 लीटर दूध प्रति दिन देने लग जाती है। लेकिन जानकारी एवं अर्थ आभाव के कारण अधिकांश पशु पालक ग्याभिन काल में गायों को किसी भी प्रकार का अतिरिक्त दाना नहीं खिला पाते है। अतः इस तकनीक को पशु पालकों में जागृति लाने हेतु राज्य में प्रसुता महिलाओं को दिये जा रहे पोषक खाद्यान्न की तर्ज पर ही देशी गायों का दूध उत्पादन बढ़ाने हेतु प्रसुता देशी गायों को ब्याने के दो माह पूर्व 1.5 क्विंटल अतिरिक्त खाद्यान्न वी.पी.एल. योजना की तर्ज पर प्रति ग्याभिन गाय के आधार पर अनुदान पर दिया जाना प्रस्तावित करवाकर देशी गायों से वंाछित उत्पादन दिया जा सकता है।
कृषकों को बढ़ते ईंधन के झझंट से बचाने हेतु गोबर गैस प्लंाट की स्थापना हेतु ड्रिप इरीगेशन/सोलर सेट आदि की तरह ही अनुदान की सीमा 75-90 प्रतिशत तक बढ़ा कर ईंधन संकट से बचाया जा सकता है।
एक व्यस्क गौ वंश प्रतिदिन 15 किलो गोबर देते हुए एक वर्ष में 5.4 टन उत्पादित करता है जिससे 1.8 टन जैविक खाद या 700 किलो सूखी लकड़ी(सात वृक्षों) के बराबर ईंधन योग्य कंडे तैयार होते हैं। गांव-गांव में कृषकों रोजगार उपलब्ध करवाने एवं जैविक खेती का प्रचलन बढ़ने हेतु गौ मूत्र कीट नियंत्रक एवं पंचगव्यों से पौध संवर्धक बनाने के कुटीर उद्योग प्रारम्भ करवाने एवं उत्पादित माल को बेचने हेतु राज्य स्तर पर प्रयास करने की आवश्यकता है।
अतः कह सकते है पशुपालन ही एक ऐसा व्यवसाय है जो कृषको के फालतू समय का सदुपयोग करवाते हुऐ वर्ष पर्यन्त रोजगार एवं नियमित आमदनी उपलब्ध करवा कर किसानों को आर्थिक रूप से सम्पन्न बना सकता है। पशुपालन व्यवसाय कृषक परिजनो को पशु प्रोटीन युक्त दूध उपलब्ध करवा कर कुपोषित होने से बचाता है, वहीं भूमि की उर्वरकता को बनाऐ रखने के लिए आवश्यक गोबर रूपी अमुल्य खाद भी उपलब्ध करवाता है। पशु पालक उक्त तकनीकियों को अपना कर डेयरी व्यवसाय में वांछित लाभ लेते हुए दूध उत्पादन बड़ाकर अग्रणी श्रेणी में ला सकते हैं। अधिक जानकारी के लिए प्रत्येक जिले में स्थित कृषि विज्ञान केन्द्रों पर सम्पर्क कर सकते हैं।

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