॥ श्रीसुरभ्यै नमः ॥ वन्दे धेनुमातरम् ॥
यया सर्वमिदं व्याप्तं जगत् स्थावरजंगमम्।
तां धेनुं शिरसा वन्दे भूतभव्यस्य मातरम्॥
॥याद करो दधि-माखन-प्रेमी॥
गौ, गीता, गंगा, गायत्री, मत भूलो गोपाल को,
शीश झुकाओ, मातृ भूमि को भारत हृदय-विशाल को।
गौ जननी सम्पूर्ण विश्व की, बतलाता इतिहास है,
इसके तन में सभी देवताओं का पावन वास है।
अपनी सेवा से उत्पन्न करती कृषकों के भाल को॥1॥
गीता देती समर भूमि में जीवन का उपदेश है,
बाधाओं पर विजय दिलाना गीता का संदेश है।
देती काट मधुर वाणी से भव के दारूण जाल को॥2॥
भारत के हृदय स्थल पर बहती गंगा की धार है,
मरण-घङी में जिसका जल कर देता भव से पार है।
नमन करो, संस्कृति रक्षिका, वक्षस्थल-जयमाल को॥3॥
गायत्री वेदों की माता, महामंत्र जप योग्य है,
देती है सुख, शांति, शक्ति, सम्पदा और आरोग्य है।
जपो वृद्ध जन और युवाओं, हे भारत के बालको॥4॥
श्रीकृष्ण जगद्गुरू, मानवता करने आए उद्धार थे,
गौ, गोवर्धन और गीता के बने स्वयं आधार थे।
याद करो, दधि-माखन-प्रेमी नन्द-यशोदा लाल को॥5॥
अखिल गोवंश की जय…..
         ॥कामधेनु-कल्याण॥

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