कृषि हेतु पंचगव्य

कृषि के विकास में पंचगव्य अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं| पंचगव्य न केवल मिट्टी की गुणवत्ता एवं उर्वरकता को सुदृढता प्रदान करते हैं अपितु ये जैविक कीटनाशक तथा औषधियां बनाने में भी उपयुक्त होते हैं जिनसे फसल के रोग नष्ट होते हैं| इन सभी का सन्दर्भ हमारे प्राचीन आर्ष ग्रंथों में मिलता है जिसे वृक्ष आयुर्वेद कहा जाता है|
क्या है जैविक कृषि?
जैविक कृषि, कृषि की वह व्यवस्था है जिसमें विषैले घटकों (विषैले कीटनाशक, खादें, होरमोन, अतिरिक्त चारा इत्यादि) की मांग को बिलकुल समाप्त कर दिया जाता है या न के बराबर कर दिया जाता है| अधिकांशतः जैविक कृषि फसलों की अदल बदल (crop rotation), फसलों के अवशेष, पशु मल से तैयार खाद, खेतों के अतिरिक्त जैविक कूड़े, पत्थरों से प्राप्त खनिज तथा प्राकृतिक रूप से प्राप्त होने वाले पोषक तत्वों एवं पेड़ पौधों से प्राप्त होने वाली रक्षा प्रणाली पर निर्भर करती है|

जैविक कृषि के लाभ तथा अन्य पहलू
लगभग सम्पूर्ण एशिया की भूमि आवश्यक पोषक तत्वों में से 5 महत्वपूर्ण पोषक तत्वों की कमी को झेल रही है| इसका प्रमुख कारण है विषैले कीटनाशकों तथा खादों द्वारा मिट्टी में व्याप्त पोषक तत्वों का असंतुलन तथा जैविक खादों के प्रयोग में कमी| मात्र जैविक पद्धति ही मिट्टी के होने वाले इस ह्रास से उसे उबार सकती है तथा फसलों की उन्नत पैदावार को सुनिश्चित कर सकती है|
मिट्टी में पाया जाने वाला जैविक तत्व ही मिट्टी में प्राणों का आधार है| ऐसी कोई भी चीज़ जो इसे हानि पहुँचाती है, वह अप्रत्यक्ष रूप से मिट्टी, फसल और अंत में हमारे स्वास्थ्य को हानि पहुँचाती है| तमिल नाडू की ही बात करें तो वहाँ मिट्टी में जैविक तत्वों का स्तर मात्र 30 वर्षों में 1.2% (1970) से गिरकर 0.60% (2000) रह गया है| जैविक तत्वों के स्तर में हुई इस भारी गिरावट के कारण फसलों के उत्पादन में भी 30% की गिरावट का अनुभव हुआ है| केवल और केवल जैविक खादों से ही मिट्टी की उत्पादक क्षमता को बढ़ाया जा सकता है| मात्र 1% जैविक तत्वों की वृद्धि से 12% तक पैदावार बढ़ाई जा सकती है|
आज विश्वस्तर पर जैविक कृषि सभी का ध्यान आकर्षित कर रही है| जैविक फसलों की मांग बढ़ने से नए व्यापारिक अवसरों की बढ़त हुई है| इस अवसर को ऐसी नीतियां चाहिए जिससे छोटे तथा मध्यम वर्गीय कृषकों के हित सुरक्षित रह सकें| जैविक कृषि द्वारा उन फसलों को उगाना चाहिए तथा उन क्षेत्रों में इसका प्रयोग करना चाहिए जहाँ तुलनात्मक लाभ की स्थिति हो| जैसे, जैविक कृषि द्वारा ऐसी फसलों को उगाना चाहिए जिनका मूल्य अधिक हो| उदहारण के लिए; फल, मसाले, औषधीय वनस्पतियां इत्यादि| जैविक कृषि को मात्र पारंपरिक तरीकों पर ही केवल निर्भर नहीं रखना चाहिए बल्कि कुछ ऐसे नए प्रयोग भी काम में लाने चाहिए जिनसे मिट्टी की निचली परतों का भी भरपूर लाभ लिया जा सके| पारंपरिक रूप से उपयोग में लाई जाने वाली ऐसी प्रणालियाँ जिनसे खरपतवार तथा कीड़ों से फसलों की रक्षा होती है, को स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर ही प्रयोग में लाया जाना चाहिए|
भारतीय कृषि व्यवस्था की एक विशेषता रही है कि इसमें एक अच्छी खासी मात्रा में फसल अवशेष प्राप्त होते हैं| एक आंकड़े के अनुसार भारत में लगभग 273.63 metric tonne फसलों के अवशेष हैं जिनका पौष्टिक मूल्य 5.67 metric tonne है| इन अवशेषों को पुनः उपयोग में लाकर विषैली खादों का स्थान लिया जा सकता है| ऐसा एक विशालकाय भंडार है इन अवशेषों का जिनका अभी तक ठीक से उपयोग नहीं किया जा सका है| लगभग 750 metric tonne गाय का गोबर तथा 250 metric tonne भैंस का गोबर खाद के रूप में उपलब्ध है| फसलों की आवृत्ति (crop rotation) से (जिनमें दालें इत्यादि सम्मिलित हैं) वायु में उपलब्ध nitrogen को मिट्टी द्वारा सोख लिया जाता है जिससे मिट्टी में nitrogen का स्तर बढ़ता है तथा विषैली खादों के रूप में अलग से nitrogen नहीं देनी पड़ती|
जैविक कृषि के लिए उपयुक्त क्षेत्रों का चयन करने के अतिरिक्त ऐसी फसलों का भी चयन करना चाहिए जिन पर जैविक विधि से कृषि करके ऐसे उत्पाद लिए जा सकें जिनका अंतर्राष्ट्रीय बाज़ार में अच्छा मूल्य हो| सामान्यतः जैविक से अभिप्राय एक ऐसी प्रणाली से है जिसमें अनुवांशिक (genetically modified) रूप से बिगाड़े या बदले गए बीजों तथा जीवों का उपयोग न किया गया हो, किसी प्रकार से हानि पहुंचाने वाले रसायनों का उपयोग न किया गया हो तथा किसी प्रकार के हानिकारक विकिरण का उपयोग न हुआ हो| जैविक कृषि तो एक ऐसी व्यवस्था है जो जैविक विविधताओं, जैविक चक्रों तथा मृदा के जैविक चक्र में बिना किसी छेड़ छाड़ कर उसे पुष्ट करे| इससे न केवल अधिक फसलों की प्राप्ति होती है बल्कि इसके उत्पादों से मनुष्य एवं प्रकृति के स्वास्थ्य की पुष्टि होती है|
देवलापार सहित ऐसे कई स्थानों पर जैविक कृषि पर शोध निरंतर चल रहा है| यहाँ vermi compost, कीटनियंत्रक तथा अमृतपानी जैसे कई उत्पाद गोमय तथा गोमूत्र से तैयार किये जाते हैं| व्यापक स्तर पर कृषक इन उत्पादों को प्रयोग में ला रहे हैं| इन कृषकों के अनुभव यह बताते हैं कि जैविक कृषि द्वारा उनकी भूमि बहुत उपजाऊ हुई है जिससे उत्पादन में भारी बढ़ोतरी हुई है| इसके अतिरिक्त, विष युक्त खेती की तुलना में जैविक कृषि बहुत सस्ती भी पड़ती है| देवलापार में कृषकों के लिए प्रशिक्षण शिविर आयोजित होते हैं जिनमें उन्हें वह सारी जानकारी दी जाती है जिससे ऐसे उत्पाद तैयार होते हैं| भारत के कई प्रान्तों से जुड़े कृषक इसका लाभ ले रहे हैं|

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