देसी गाय विदेशीसे श्रेष्ठ क्यों ? भाग -४

ये वर्तमान कालकी विडम्बना ही है कि इस बातको समाजको बताना पड रहा है कि ‘देसी गाय विदेशीसे श्रेष्ठ क्यों है ?’ विगत आलेखोंमें हमने जाना कि देसी गायकी क्या विशेषताएं हैं ? आइए कुछ और जानते हैं देसी गायके बारेमें जिनसे यह सिद्ध होता है कि देसी गाय ही श्रेष्ठ क्यों है ? ये सब विशेषताएं जो आगे उल्लेखित हैं, वे विदेशीमें नहीं पाई जाती हैं :-
१.      यदि संयोगवश कोई विषैली या हानिकारक सामग्री भारतीय गायके भोजनमें प्रवेश करती है, तो वह उसे अपने मांसमें अवशोषित कर लेती है । वह उसे गोमूत्र, गोबर या दूधमें नहीं जाने देती या बहुत अल्प मात्रामें स्रावित (छोडती) करती है । इसपर विश्वके वैज्ञानिकोंने गहन शोध किया है । शोधकर्ताओंने अन्य पशुओंके साथ यह प्रयोग किया   है । उन्हें विभिन्न वस्तुएं खिला कर उनके दूध और मूत्रका परीक्षण किया गया; किन्तु भारतीय वंशकी गायके अतिरिक्त किसीमें यह विशेषता नहीं मिली । इसका वैज्ञानिक आधार यह है कि भारतीय वंशकी गायोंमें अमीनो एसिडोंकी एक श्रंखला होती है, उस श्रंखला में ६७ वें स्थानपर एक प्रोटीन पाया जाता है, जिसे ‘प्रोलाइन’ कहा जाता है । गायके शरीरमें एकत्रित हुआ विष भी एक प्रोटीनके रूप में मिलता है जिसे BCM7(अफीम प्रजातिका मादक पदार्थ) कहा जाता है और यह अत्यन्त ही हानिकारक होता है; किन्तु भारतीय गायके शरीरमें पाया जानेवाला ‘प्रोलाइन’ इस BCM7 को अपने साथ इतनी दृढतासे पकड लेता है कि वह विष गायके किसी भी गव्यमें(गौमूत्र, गोबर अथवा दूध) मिल ही नहीं पाता है या अत्यंत न्यून मात्रामें मिल पाता है, जबकि विदेशी नस्लकी गाय जैसी दिखने वाली जीव अपने शरीरमें ‘प्रोलाइन’ नहीं बना पाती है और उसकी जगह ‘हिस्टिडाइन’ नामक प्रोटीनका निर्माण करती है जो BCM7 विष को उसके गोबर, मूत्र या दूधमें जानेसे रोकनेमें सक्षम नहीं है । इसलिए भारतीय गायका गौमूत्र, गोबर और दूध शुद्ध है और विषाक्त पदार्थोंको दूर करते है । गायका दूध निश्चित रूपसे विष विरोधक है । गौमूत्र “पंचगव्य”में सम्मिलित है । “पंचगव्य”को सभी जीवोंकी अस्थिसे त्वचा तकके सभी रोगोंका संसाधक कहा जाता है । पंचगव्य विदेशी गायके दूधसे नहीं मिल सकता,यह मात्र देसी गायद्वारा ही प्राप्त हो सकता है; अतः देसी गाय विदेशीसे निःसंदेह श्रेष्ठ है ।
क्या कारण है कि देसी गायका घृत(घी) और उसके उत्पाद सामान्यसे अधिक मूल्यके होते हैं ?
उत्तर – देसी गायके दूधमें जो भी स्निग्धता(चिकनाई) होती है, वह अत्यंत गुणकारी होती है और गुणकारी पदार्थ संसारमें अल्प मात्रामें ही पाए जाते हैं । इसलिए अन्य दुधारू पशुओंकी अपेक्षा गौमाताके दुग्धसे अल्प प्रमाणमें मक्खन निकलता है और अल्प ही मात्रामें घी बन पाता है । इसलिए गायका घी कुछ अधिक मूल्यका होता है । वैसे जिन्हें इस कथनपर विश्वास न हो वे एक किलो गौघृत घरमें बनाके देख सकते हैं ।
प्रश्न – गौमूत्र किस गायका लेना चाहिए ?
उत्तर – जो वनमें विचरण करके, व्यायाम करके इच्छानुसार घासका सेवन करे, स्वच्छ पानी पीए, स्वस्थ हो; उस गौका गौमूत्र औषधिय गुणोंवाला होता है । शास्त्रीय निर्देश है कि – ‘‘अग्रमग्रं चरन्तीनामोषधीनां वने वने ।”
प्रश्न – गौमूत्र किस आयुकी गौका लेना चाहिए ?
उत्तर – किसी भी आयुकी गौ चाहे वह बछिया, युवा अथवा वृद्ध हो, उसका गौमूत्र प्रयोग किया जा सकता है; किन्तु गर्भवती गायके गौमूत्रके प्रयोगसे बचनेका अभिमत भी दिया जाता है ।
प्रश्न -क्या वृषभका(बैल) मूत्र औषधि उपयोगमें आता है ?
उत्तर – नर जातिका मूत्र अधिक तीक्ष्ण होता है; परन्तु औषधि उपयोगितामें अल्प नहीं है; क्योंकि प्रजाति तो एक ही है । उत्तम प्रजातिके बैलोंका मूत्र सूंघनेसे ही बंध्याको(बांझ) सन्तान प्राप्त होती है । कहा है: ‘‘ऋषभांष्चापि, जानामि राजनपूजितलक्षणान् । येषां मूत्रामुपाघ्राय, अपि बन्ध्या प्रसूयते ।।’’ (संदर्भ-महाभारत विराटपर्व)
अर्थ : उत्तम लक्षणवाले उन बैलोंका भी मुझे अभिज्ञान(पहचान) है, जिनके मूत्रको सूंघ लेने मात्रसे बंध्या स्त्री गर्भ धारण करने योग्य हो जाती है ।
प्रश्न : गौमूत्रको किस पात्रमें रखना चाहिए ?
उत्तर: गौमूत्रको तांबे या पीतलके पात्रमें न रखें । मिट्टी, कांच, चीनी मिट्टीका पात्र हो अथवा इस्पातका(स्टील) पात्र भी उपयोगी है ।
प्रश्न : गौमूत्र कब तक संग्रह किया जा सकता है ?
उत्तर: गौमूत्र आजीवन चिर गुणकारी होता है । रज(धूल) न गिरे, ठीक तरहसे ढंका हुआ हो, गुणोंमें कभी दूषित(खराब) नहीं होता है । रंग कुछ लाल, काला हो जाता है । गौमूत्रमें गंगाने वास किया है । गंगाजल भी कभी दूषित अथवा खराब नहीं होता है । पवित्र ही रहता है तथा इसमें किसी प्रकारके हानिकारक कीटाणु नहीं होते हैं ।
प्रश्न : क्या जर्सी गायके(???) वंशका गौमूत्र लिया जाना चाहिए ?
उत्तर: कदापि नहीं लेना चाहिए ।

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