देसी गाय विदेशीसे श्रेष्ठ क्यों ? भाग -३

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देसी गाय विदेशीसे श्रेष्ठ क्यों ? भाग -३

आइए जानें कुछ और गौमाताके बारेमें :_
प्रश्न-गायकी परिक्रमासे क्या प्रभाव होता है ?
उत्तर- सृष्टिके निर्माणमें जो ३२ मूल तत्त्व घटकके रूपमें हैं, वे सर्व गायके शरीरमें विद्यमान हैं; अतः गायकी परिक्रमा करना अर्थात् पृथ्वीकी परिक्रमा करने समान है । गाय जो श्वास छोडती है(ऑक्सीज़न) वह वायु एंटी-वाइरस है । गायद्वारा छोडी गई श्वाससे सभी अदृश्य एवं हानिकारक रोगाणु नष्ट हो जाते है । गायके शरीरसे सतत एक दैवीय ऊर्जा निकलती रहती है जो मनुष्य शरीरके लिए अत्यंत लाभकारी है । यही कारण है कि गायकी परिक्रमा करनेको अति शुभ माना गया है ।
प्रश्न -गायके ककुद्(कूबड) की क्या विशेषता है ?
उत्तर – गायके कूबडमें सृष्टिके निर्माता ब्रह्माका निवास है ।  यह कूबड ब्रह्माण्डसे(आकाश गंगा से) उन सभी ऊर्जाओंको ग्रहण करती है जिनसे इस सृष्टिका निर्माण हुआ है; और इस ऊर्जाको अपने पेटमें संग्रहित भोजनके साथ मिलाकर भोजनको ऊर्जावान बना देती है । उसी भोजनका पचा हुआ अंश जिससे गोबर, गौमूत्र और दूध गव्यके रूपमें बाहर निकलता है वह अमृत होता है ।
प्रश्न – गौमाताको भोजनमें क्या देना चाहिए और क्या नहीं ?
उत्तर – देसी गायको बासी एवं जूठा भोजन, दूषित फल नहीं देना चाहिए । गायको रात्रिमें चारा या अन्य भोजन नहीं देना चाहिए; क्योंकि गाय दिनमें ही अपनी आवश्यकताके अनुरूप भोजन कर लेती है । रात्रिमें उसे भोजन देना उसके स्वास्थ्यके लिए ठीक नहीं है । गायको मूल रूपमें(साबूत) अनाज भी नहीं देना चाहिए सदैव अनाजका दलिया करके ही देना गायके लिए लाभदायक होता है ।
प्रश्न – गौदुग्ध, दही, घी, छाछ एवं अन्य पदार्थोंका उपयोग कैसे करना चाहिए ?
उत्तर –  सर्वप्रथमम दूधको छान लेना चाहिए, इसके पश्चात् दूधको मिट्टीकी हांडी, लोहेके पात्र(बर्तन) या इस्पातके((स्टील) बर्तनमें धीमी आंचपर गर्म करना चाहिए ।(दूधको तांबे या विना धातु-परतके(कलाई) पीतलके बर्तनमें गर्म नहीं करें) धीमी आंच गोबरके कंडेका हो तो अत्युत्तम है । दूध गर्म होनेके उपरांत कवोष्ण(गुनगुना) रहनेपर १ से २% छाछ या दही मिला देना चाहिए ।  दूधसे दही जम जानेके पश्चात् सूर्योदयके पूर्व दहीको मथ देना अत्यंत लाभदायक होता है ।  दही मथनेके पश्चात् उसमें स्वतः नवनीत(मक्खन) ऊपर आ जाता है । इसे निकाल कर धीमी आंचपर पकानेसे शुद्ध घी बनता है । बचे हुए शेष मक्खन रहित दहीमें विना पानी मिलाए मथनेपर मट्ठा बनता है, चार पट(गुना) पानी मिलानेपर तक्र बनता है और दो गुना पानी मिलनेपर छाछ बनती है ।
प्रश्न – दूधके गुणधर्म क्या हैं ?
उत्तर – गायका दूध प्राणप्रद, रक्तपित्तनाशक, पौष्टिक और दिव्य रसायन है। उनमें भी श्यामा(काली) गायका दूध त्रिदोषनाशक, परमशक्तिवर्धक और सर्वोत्तम होता है । गाय अन्य पशुओंकी अपेक्षा अत्यधिक सत्त्वगुणयुक्त प्राणी है और दैवी-शक्तिका केंद्रस्थान है । दैवी-शक्तिके योगसे गोदुग्धमें सात्त्विक बल होता है । इस दुग्धके प्रयोगसे शरीर आदिकी पुष्टिके साथ भोजनका पाचन भी विधिवत् अर्थात् उचित प्रकारसे हो जाता है । यह कभी रोग नहीं उत्पन्न होने देता है । आयुर्वेदमें विभिन्न रंगवाली गायोंके दूध आदिका पृथक-पृथक गुण बताया गया है । गायके दूधको सर्वथा छान कर ही पीना चाहिए;  क्योंकि गायके स्तनसे दूध निकालते समय स्तनोंपर रोम होनेके कारण दुहनेमें घर्षणसे प्रायः रोम टूट कर दूधमें गिर जाते हैं । गायके रोमके पेटमें जानेपर हानि होती है । आयुर्वेदके अनुसार किसी भी पशुका बाल पेटमें चले जानेसे हानि ही होती है ।  गायके रोमसे तो राजयक्ष्मा(तपेदिक,टीबी) आदि रोग भी हो सकते हैं इसलिए गायका दूध छानकर ही पीना चाहिए ।
प्रश्न – गाय और बैलके सिंगको आजकल कृत्रिम तैलीय रंग(ऑइलपेंट) और अन्य पदार्थोंसे रंग दिया जाता है । क्या यह उचित है ?
उत्तर – गाय और बैलके सिंगको ऑइलपेंट और किसी भी प्रकारकी सजावट इसलिए नहीं करनी चाहिए क्योंकि सिंग चंद्रमासे आने वाली ऊर्जाको अवशोषित करके शरीर को देते है । यदि इसे रंग दिया जाए तो वह प्रक्रिया बाधित होती है ।
प्रश्न – क्या भिन्न प्रांतोंकी प्रजातिवाली गायोंको किसी अन्य वातावरणमें पाला जा सकता है ?
उत्तर – भिन्न-भिन्न प्रजातियां विशेष स्थान एवं वातावरणके अनुरूप बनी हैं । यदि हम उन्हें दूसरे वातावरणमें ले जा कर रखेंगे तो उन्हें भिन्न वातावरणमें रहनेपर कठिनाई होती है, जिसका प्रभाव गायके शरीर एवं गव्यों दोनोंपर पडता है और आठसे दस पीढियोंके उपरांत वह प्रजाति परिवर्तित होकर स्थानीय भी हो जाती है; अतः यह प्रयोग नहीं करना चाहिए ।

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