भगवान व्यासदेव की द्रष्टि में गोसेवा

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भगवान व्यासदेव की द्रष्टि में गोसेवा

पुराणों में अनेक जगह गोमती विध्या और गो-सावित्री स्तोत्र का उल्लेख प्राप्त होता है, वे भगवान व्यास देव की रचनाएँ हैं
इनमें उन्होंने कहा है कि संसार की रक्षा के लिए वेद और यज्ञ ही दो श्रेष्ठ उपाय हैं और इन दोनों का संचालन गाय के दूध,घी और बैलों के द्वारा उत्पन्न किये वीरिहि से निर्मित चरु, पुरोडाश, हविष्य आदि से ही संपन्न होता है
मूलतः ब्राहम्मण, वेद और गौ- ये तीनों ही एक हैं
यज्ञ की संपन्नता के लिए ब्राहम्मण और गौ- ये दोनों ही अलग-अलग रूप में दीखते हैं 
उनके कथानुसार गायों से सात्विक वातावरण का निर्माण होता है,गायें अत्यंत पवित्र हैं इसलिए जहाँ रहती हैं वहां कोई भी दूषित तत्व नहीं रहता उनके शरीर से दिव्य तथा सुगंधयुक्त वायु प्रवाहित होती है और सब प्रकार का कल्याण ही कल्याण है 
गोएं स्वर्ग जाने की सीढ़ी हैं तथा गोएं समस्त प्राणियों को खिलाने -पिलाने-जिलाने वाली हैं 
खेती के कामों में गायों को बहुत आराम से प्रयुक्त करना चाहिए, उन्हें सदा ही सुख देना चाहिए, बीमार होने पर औषधि की व्यवस्था करनी चाहिए
ये बातें भविष्य पुराण के उत्तरपर्व,मधयपर्व एवं महाभारत के वैश्रणवधर्म-पर्व तथा बृहद व्यासस्मृति में भी कही गयी हैं 
बड़े खेद की बात है कि आज गोचर भूमि की व्यवस्था प्रायः नहीं रह गयी है इससे गायों को बड़ा कष्ट हो गया है तथा उनकी स्वक्षन्द्ता मिट सी गयी है
इसलिए भारत में निवास करने वाले सभी धर्मात्मा लोगों से प्रार्थना है कि गोचर भूमि की व्यवस्था पुनः प्रवर्तित करें 
गोओं की प्रसन्नता से सभी देवता, ऋषि भगवान भी प्रसन्न होंगे तभी राष्ट्र का कल्याण होगा 
यही भगवान व्यासदेव के समस्त वेद और पुराणों, धर्मशास्त्रों महाभारत आदि में प्रदिष्ट गो-सेवा धर्म के प्रतिपादन-पद्धति का संछिप्त शारांश है
जय गऊ माता की

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