संरक्षण का रास्ता गो रक्षा में प्रगति

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प्रागैतिहासिक काल में हमारे पूर्वज गायों को अपने बच्चों की तरह प्रेमपूर्वक देखभाल करते थे । यज्ञों के दौरान गायों को चढ़ाव और विनिमय में अत्यंत महत्व था । किसी व्यक्ति के धन का आकलन उसकी गायों की संख्या द्वारा किया जाता था । राजाओं को कर और भेंट देने में गाय का महत्व नकदी, आभूषणों, हाथियों और घोड़ों से अधिक था ।

सामाजिक स्थिति का परिणाम :

गायों की संख्या पर आधारित सम्मान इस प्रकार थे

नंदराज – १ कारोड़
वृषभ राज – ५० लाख
वृष भानु – १० लाख
नंद – ९ लाख
उपांड – ५ लाख
व्रज – १० हजार
गो संरक्षण, संवर्धन का रास्ता :

रामायण में रघुवंश का आरंभ दिव्य गाय की आशिष से होता है ।
महाभारत युग में श्री कृष्ण और उनके कुटुंबियों द्वारा गाय की अनुकरणीय सेवा की गई ।
अद्वैत दर्शन की पुनर्स्थापना में आदि शंकराचार्य ने गाय को प्रमुख स्थान दिया ।
गायों की देख-भाल, उनके लिये चरने योग्य भूमि, आहार, की सार संभाल के लिये चाणक्य के अर्थशास्त्र (मौर्य युग में) एक गो अध्यक्ष नामक राजकीय अधिकारी की नियुक्ति की जाती थी । (कौटिल्य अर्थशास्त्र – गो अध्यक्ष अध्याय)
अशोक महान का विश्वास था कि राष्ट्र की समृद्धि और गौरव हेतु गायों का विकास आवश्यक है ।
शातवाहन वंश ने गोपालन और गोदान को सर्वाधिक महत्व दिया ।
गायों के लिये राजपूतों ने अपने प्राण दे दिये । कुटिल उद्देश्यों तहत मोहम्मद गोरी ने अपने सैनिकों के आगे गायें रखकर पृथ्वीराज पर आक्रमण किया । गायों की हत्या न करपाते हुए पृथ्वीराज ने हार मान ली ।
शिवाजी ने १७ वर्ष की आयु में वधशाला के तरफ गाय को खींचकर ले जाते हुए कसाई का शिरच्छेद किया ।
मुगलवंश के संस्थापक बाबर ने अपने पुत्र हुमायुं को गायों को कभी न मारने को लिखा ।
अबुल फजल ने आईने अक्बरी में लिखा कि हिंदू प्रजा की भावनाओं का सम्मान करते हुए अकबर ने गोमांस भक्षण पर प्रतिबंध लगा दिया था ।
अपने यात्रा विविरण में बर्नियर ने लिखा है कि जहांगीर के राज्य में गो हत्या प्रतिबंध सख्ती से पालन होता था ।
विजयनगर राजय में बहु संख्यक लोग मांस भक्षण करते थे । पर गोमांस को कोई भी नहीं लेता था ।
मैसूर राज्य के आयुक्त मार्क कबन ने राज्य प्रशासन को ९ भागों में विभक्त किया । इनमें से एक विभाग कर्नाटक के गौरव अमृत महल बैलों के नाम पर रखा गया और इसमें गो पालन का कार्य होता था ।
सर्वोच्च न्यायालय के १९५८ के एक निर्णय में उल्लेख है कि १८वीं सदी में हैदर अली का आदेश था कि गोवधकर्ता के हाथ काट दिये जाने चाहिए ।
मैसूर राज्य में ४,१३,५३९ एकड़ भूमि पर २४० चरागाह मैदान थे । जो कि ‘बेण्णे चावड़ी’ प्रजाति की गायों के लिये थे । ये गायें १६१७ के वर्ष के आसपास राज्य संरक्षण में फल फूल रही थीं । टीपू सुल्तान के समय में इनका नाम अमृत महल रख दिया गया और इनके लिये सुरक्षित की गयी भूमि को अमृत महल सुरक्षित भूमि से सूचित किया गया ।
पहला स्वतंत्रता संग्राम (१८५७) अंग्रेजों द्वारा कारतूसों में गाय और सुअर की चर्बी के प्रयोग के कारण हुआ ।
अपने वंश में सर्वाधिक शक्तिशाली माधवराव पेश्वा ने गो हत्या पर प्रतिबंध लगाया । उनका विचार था कि गो भक्षकों को समस्त भारत से निकाल दिया जाये ।
१८७२ में नामधारी सिखों के नेतृत्व में पंजाब में कल्लगाहों की स्थापना के विरुद्ध कुका आंदोलन हुआ ।
वीर सावारकर, चंद्रशेखर आजाद, बाल गंगाधर तिलक, गोपाल कृष्ण गोखले, वल्लभभाई पटेल और महात्मा गांधी जैसे प्रमुख स्वतंत्रता सेनानियों ने गो हत्या के विरोध में आवाज उठाई । यह वचन दिया गया कि स्वतंत्र भारत में गो हत्या पर रोक लगेगी ।
संविधान की धारा १८ में गो हत्या पर प्रतिबंध लगाने की बात है ।
१९६६ में गोवध विषेध हेतु लाखों लोगों ने संसद के विकट प्रदर्शन किया ।
१९७९, १९८५, १९९०, १९९४, १९९९ और २००० में संसद में गो हत्या विषेध के लिये सदस्यों ने निजी

प्रस्ताव प्रस्तुत किये ।

तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने १९८२ में राज्य सरकारों से गोवध पर प्रतिबंध लगाने को लिखा ।
१९४४ में गुजरात में और बाद में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में गो हत्या पर रोक लगा ।
राष्ट्रीय मवेशी आयोग २००१ में स्थापित हुआ ।
श्री दत्त शरणानंदजी महाराज के नेतृत्व में राजस्थान में पथमेडा में गोपाल गोवर्धन गोशाला के अंतर्गत एक लाख से भी अधिक गायों का पालन पोषण होता है ।
गायों और गो उत्पादों पर श्री सभा बहादुर सिंह प्रशंसनीय शोधकार्य कर रहे है ।

रामचंद्रापुर मठ के पूज्य जगद्गुरु शंकराचार्य श्री राघवेश्वर भारती स्वामीजी के नेतृत्व और निर्देशन में कामदुघा योजना चालू की गयी है । इस योजना के चार मूलभूत उद्देश्य हैं – भारतीय प्रजाति की गायों की रक्षा, उनकी समृद्धि, उन पर शोधकार्य और उनके बारे में जागृति । होसनगर के अमृतधारा गोलोक अवशिष्ट ३३ देसी गायों की नस्लों में से ३० का संरक्षण एवं पालन कर रहा है । देश भर में ऐसे १०८ केंद्रों की स्थापना की योजना है । प्रकल्प की आर्थिक आत्मनिर्भरता उत्साहजनक है ।
निम्नलिखित प्रजातियों के लिये विकास केंद्र इन स्थानों पर स्थापित किये गये हैं :
राठी नसल – बिकानेर में
दियोनि नसल – बीदर और आंध्रा में
अमृत महल नसल – अज्जंपुर में (कर्नाटक)
हल्लिकार नसल – तुमकूर में
खिलारि नसल – हावेरी में
कृष्णा नसल – होसनगर में (कर्नाटक)
मलेनाडु गिड्ड नसल – मुळिया, कैरंगळ, भान्कुळि में (कर्नाटक)
कासरगोड नसल – बजकूड्लु में (केरल)
हर्याणा, थारपरकर नसल के केंद्र भी हैं ।

वर्तमान में अनेक धार्मिक और अन्य संगठन गो संरक्षण / पालन में सक्रिय हैं । गाय केंद्रों का पिंजरापोल नेटवर्क प्रसिद्ध है ।
विश्व के अन्य देशों में :

क्यूबा में फिडेल कास्प्रो द्वारा बनाया हुआ गो हत्या विषेध कानून आज भी लागू है ।
ईरान में गोहत्या पर कानूनी प्रतिबंध है ।
इंडोनेशिया के नूपानिसद द्वीप में गोमांस भक्षण निषिद्ध है ।
ब्राजील की ९८% गायें भारतीय ओंगोल प्रजाति कि हैं ।
आस्ट्रेलिया आदि देशों ने भारतीय और स्थानीय गायों के संकर प्रजनन द्वारा ‘ब्राह्मण’ प्रजाति की गायें तय्यार की हैं ।
दक्षिण अफ्रिका में दहेज में २० गायें देने की परंपरा है ।
बर्मा में गो हत्यारों को फांसी दी जाती थी ।
अफगानिस्तान में ११०वां अहल सुन्नत ने गो हत्या के विरुद्ध फतवा जारी किया है ।
बेबिलोन और सुमेरु सभ्यताओं में गोवध निषिद्ध था ।

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