गौमूत्र :

गौमूत्र : गौमूत्र को सबसे उत्तम औषधियों की लिस्ट में शामिल किया गया है। वैज्ञानिक कहते हैं कि गौमूत्र में पारद और गंधक के तात्विक गुण होते हैं। यदि आप गो-मूत्र का सेवन कर रहे हैं तो प्लीहा और यकृत के रोग नष्ट कर रहे हैं। * गौमूत्र कैंसर जैसे असाध्य रोगों को भी जड़ से दूर कर सकता है। गोमू‍त्र चिकित्सा वैज्ञानिक कहते हैं कि गाय का लीवर 4 भागों में बंटा होता है। इसके अंतिम हिस्से में एक प्रकार का एसिड होता है, जो कैंसर जैसे रोग को जड़ से मिटाने की क्षमता रखता है। गौमूत्र का ‍खाली पेट प्रतिदिन निश्‍चित मात्रा में सेवन करने से कैंसर जैसा रोग… Read More

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पंचगव्य निर्माण और फायदे

    पंचगव्य निर्माण और फायदे     पंचगव्य का धार्मिक महत्व तो है ही साथ ही मानव जीवन के स्वास्थ के लिए भी कई गुना इसका महत्व है। पंचगव्य क्या है? पंचगव्य गाय के दूध, घी, दही, गोबर का पानी और गोमूत्र का मिश्रण है। इन पाचों चीजों को मिलाने से जो तत्व बनता है वो पंचगव्य कहलाता है। आयुर्वेद में इसे औषधि के रूप में माना गया है। पंचगव्य रोग नाशक औषधि है क्योंकि गाय के गोबर में चर्म रोग को दूर करने की क्षमता है। गाय के मूत्र में आक्सीकरण की क्षमता की वजह से डीएनए को खत्म होने से बचाया जा सकता है।       गाय के… Read More

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16.पञ्चगव्य -चिकित्सा

…………….पञ्चगव्य -चिकित्सा……………..  १ – क्षयरोग – में गाय का घी खजूर , मुनक्का , मिश्री ,मधु, तथा पिप्पली इन सबका अवलेह बना कर सेवन करने से स्वरभेद ,कास ,श्वास ,जीर्णज्वर तथा क्षयरोग का नाश होता है ।  २ – मुदुरेचन के लिए – १०-२० नग मुनक्को को साफकर बीज निकालकर ,२०० ग्राम गाय के दूध में भलीभाँति उबालकर ( जब मुनक्के फूल जाएँ ) दूध और मुनक्के दोनों का सेवन करने से प्रात: काल दस्त साफ़ आता है ।  ३ – रात्रि में सोने से पहले १०-२० मुनक्को को थोड़े से गाय के घी में भूनकर सेंधानमक चुटकी भर मिलाकर खाये। प्रात: ही पेट साफ़ हो जायेगा ।  ४ –… Read More

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15.पञ्चगव्य- चिकित्सा

…………….पञ्चगव्य- चिकित्सा……………..  १ – बवासीर के मस्सों से अधिक रक्त स्त्राव होता हो तो ३-८ ग्राम अावलाचूर्ण का सेवन गाय के दूग्ध सेवन बनी दही की मलाई के साथ दिन मे २-३ बार देनी चाहिए ।लाभ अवश्य होगा ।  २ – रक्तातिसार – रक्तातिसार से अधिक रक्त स्राव हो तो आवॅला के १०-२० ग्राम रस मे १० ग्राम शहद और गाय का घी ५ ग्राम मिलाकर पिलावें और उपर से बकरी का दूध १०० ग्राम तक दिन में तीन बार पिलावें ।  ३ – पित्तदोष- आवॅलाे का रस सर्वत्र मधु, गाय के घी इन सब द्रव्यों को सम्भाग लेकर आपसे घोंटकर कि गयी रस क्रिया पित्तदोष तथा रक्तविकार जनित नेत्ररोग… Read More

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14.पञ्चगव्य- चिकित्सा

…………. पञ्चगव्य- चिकित्सा…………..  १ – बलवर्धन- ११.५ ग्राम ताज़ी अमरबेल को कुचलकर स्वच्छ महीन कपड़े में पोटली बाँधकर १/२ किलोग्राम गाय के दूध में डालकर या लटकाकर धीमी आँच में पकाये । जब एक चौथाई दूध जल जाय ,तब ठंडा कर मिश्री मिलाकर सेवन करने से निर्बलता दूर होती है ।विशेष ब्रह्मचर्य में रहना आवश्यक है ।  २ – स्तन्यजनन – स्तन में दूध की वृद्धि गेहूँ की सूजी १ ग्राम ,अखरोट के पत्ते १० ग्राम पीसकर दोनों को मिलाकर , गाय के घी में पूरी बनाकर सात दिन तक खाने से स्तन्य ( स्त्री दूग्ध ) की वृद्धि होती है ।  ३ – अखरोट का १० से ४० ग्राम… Read More

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13.पञ्चगव्य- चिकित्सा

…………..,,,,पञ्चगव्य- चिकित्सा………………  १ – दाद खुजली- अडूसे के दस से बारह पत्र तथा दो से पाँच ग्राम हल्दी को एक साथ गोमूत्र में पीसकर लेप करने से खुजली व शोथ कण्डुरोग शीघ्र नष्ट होता है ।इससे दाद उक्वत में भी लाभ होता है ।  २ – आमदोष- मोथा ,बच,कटुकी, हरड़ ,दूर्वामूल ,इन्हें सम्भाग मिश्रित कर ५-६ ग्राम की मात्रा लेकर १०-२० मि०ली० गोमूत्र के साथ शूल में आमदोष के परिपाक के लिए पिलाना चाहिए ।  ३ – अगस्त के पत्तों का चूर्ण और कालीमिर्च का चूर्ण समान भाग लेकर गोमूत्र के साथ बारीक पीसकर मिर्गी के रोगी को सूघाँने से लाभ होता है ।  ४ – अगस्त के पत्तों को… Read More

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12. पञ्चगव्य-चिकित्सा

…………. पञ्चगव्य-चिकित्सा……………  १- संग्रहणी – ताज़े मीठे आमों के पचास ग्राम ताज़े स्वरस मे २०-२५ग्राम गाय के दूध से बनी मीठा दही तथा एक चम्मच शुंठी चूर्ण बुरक कर दिन मे २-३ बार देने से कुछ ही दिन में पुरानी संग्रहणी अवश्य दूर होती है तथा ( संग्रहणी में आम्रकल्प बहुत लाभदायक है )  २ – परिणाम शूल- प्रात: ८ बजे और सांय ४ बजे मीठे पके आमों को इतनी मात्रा में चूस लें कि आधा किलो रस पेट में चला जाय उपर से २५० ग्राम दूध पी लें ,और पानी बिलकुल न पीएँ । एक घंटा बाद उबालकर ठंडा किया हुआ पानी पी सकते है । दाेपहर के भोजन… Read More

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११ – पञ्चगव्य चिकित्सा

११ – पञ्चगव्य चिकित्सा  १ – अर्कमूल की छाल १० ग्राम ,त्रिफला चूर्ण १० ग्राम ,एक साथ आधा किलो जल में अष्टमांस क्वाथ सिद्ध कर प्रतिदिन प्रात: उसमें १ ग्राम मधु और तीन ग्राम मिश्री मिलाकर सेवन कराये,और साथ ही अर्कमूल को गाय के दूध से बनी छाछ में पीसकर श्लीपद पर गाढ़ा लेंप करे ,४० दिन में पूर्ण लाभ आयेगा ।  २ – आक के १०-२० फलो को बिना अग्नि मे तपाये हुये मिट्टी के बर्तन में भरकर ,मुँह बन्द कर गाय के गोबर से बने उपलो की आग में फूँककर ठन्डा होने दें ,और फिर भस्म को निकालकर सरसों के तेल में मिलाकर लगाये ।यह गलित कुष्ठ की प्रथम… Read More

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10 पञ्चगव्य चिकित्सा

पञ्चगव्य चिकित्सा  १ – आक की छाल तथा आक की कोंपले या छोटी-छोटी कोमल पत्तियाँ ५०-५०ग्राम इन दोनों को २००ग्राम आक के दूध में पीसकर गोला बनाकर मिट्टी के पात्र में मुँह बंद करके गाय के गोबर से बने कण्डो की आँच मे फूँक कर भस्म बना ले । ठंडा होने पर भस्म को निकालकर मटर जैसी छोटी-छोटी गोलियाँ बनाकर एक दो गोली पानी के साथ लेने से भगन्दर व नासूर दूर होते है ।  २ – छुवारों के अन्दर की गुठली निकालकर उसमें आक का दूध भर दें ,फिर इनके उपर आटा लपेटकर पकावें ,उपर का आटा जब जल जाये तब उसमें से छुवारे निकाल कर उन्हें पीसकर मटर… Read More

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9 पञ्चगव्य चिकित्सा

………….पञ्चगव्य चिकित्सा……………. १. आक के भली प्रकार पीले पड़े पत्तों को थोड़ा सा गाय का घी चुपड़ कर आग पर रख दें ।जब वे झुलसने लगे ,झटपट निकाल कर निचोंड लें ।इस रस को गर्म अवस्था में ही कान में डालने से तीव्र तथा बहुविधि वेदनायुक्त कर्णशूल शीघ्र नष्ट हो जाता है । २. आँख का फुला जाला– आंक के दूध में पुरानी रूई को तीन बार तर कर सुखा लें फिर गाय के घी में तर कर बड़ी सी बत्ती बनाकर जला लें । बत्ती जलकर सफ़ेद नहीं होनी चाहिए ,इसे थोड़ी मात्रा मे सलाई से रात्रि के समय आँखों में लगाने से २-३ दिन में लाभ होना प्रारम्भ हो जाता… Read More

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